शहरी भूमि सीमा कानून पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: 1999 के निरसन से पहले जमीन पर वास्तविक कब्जा साबित करना राज्य की जिम्मेदारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शहरी भूमि (सीमा एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत तय सीमा से अधिक जमीन पर राज्य सरकार को अपना कब्जा बनाए रखने के लिए यह साबित करना होगा कि 1999 में कानून निरस्त होने से पहले जमीन का वास्तविक कब्जा ले लिया गया था। यदि राज्य ऐसा साबित करने में विफल रहता है, तो जमीन के मालिक को शहरी भूमि (सीमा एवं विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 का लाभ मिलेगा।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा कि धारा 10(5) के तहत जारी ऐसा नोटिस, जिस पर तारीख दर्ज न हो और जिस पर न तो जमीन के मालिक के हस्ताक्षर हों और न ही दो गवाहों के, जमीन का कब्जा सौंपे जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब विवाद इस बात पर हो कि जमीन का वास्तविक कब्जा कभी राज्य को मिला भी था या नहीं, तो याचिका को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
मामले में याचिकाकर्ता मूल भूमिधर राम निहोर का पोता है। राम निहोर ने 1976 के कानून की धारा 6(1) के तहत भूमि संबंधी विवरण दाखिल किया था। इसके बाद 20 मई 1982 को धारा 8(4) के तहत पारित आदेश में वाराणसी के परगना शिवपुर स्थित हसनपुर और सिंहपुर गांवों की कुल 8,834.60 वर्ग मीटर जमीन को निर्धारित सीमा से अधिक खाली भूमि घोषित किया गया। इसके बाद राज्य राजपत्र में धारा 10(3) के तहत अधिसूचना प्रकाशित की गई और स्वेच्छा से कब्जा सौंपने के लिए धारा 10(5) के तहत नोटिस जारी किए जाने की बात कही गई। अधिकारियों के अनुसार, 20 जुलाई 1998 को जमीन वाराणसी विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई।
हालांकि, राजस्व अभिलेखों में जमीन का नाम राम निहोर के नाम पर दर्ज रहा, जिनकी मृत्यु 1992 में हुई। इसके बाद उनके बेटे लाल चंद्र के नाम पर प्रविष्टियां दर्ज रहीं, जिनकी मृत्यु 2014 में हुई। फिर जमीन याचिकाकर्ता के नाम पर दर्ज रही। राज्य के नाम पर प्रविष्टियां पहली बार 20 सितंबर 2021 के आदेश से दर्ज की गईं। इससे पहले याचिकाकर्ता की एक रिट याचिका का 15 जून 2021 को निस्तारण करते हुए संबंधित अधिकारियों को उसके अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया गया। बाद में 18 अक्टूबर 2023 को अभ्यावेदन खारिज कर दिया गया, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि राम निहोर को धारा 8(3) के तहत नोटिस कभी तामील नहीं कराया गया और धारा 8(4) का आदेश एकतरफा पारित किया गया। धारा 10(5) का नोटिस भी बिना तारीख के था और उसे कभी विधिवत तामील नहीं कराया गया। इसके अलावा, धारा 10(6) के तहत जबरन कब्जा लेने की प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई। याचिकाकर्ता का कहना था कि जब जमीन का वास्तविक कब्जा कभी हस्तांतरित ही नहीं हुआ, तो उसे 1999 के निरसन कानून का लाभ मिलना चाहिए।
इसके विपरीत, राज्य सरकार ने दलील दी कि निरसन कानून लागू होने से काफी पहले भूमि संबंधी कार्यवाही पूरी हो चुकी थी और कब्जा लिए जाने के करीब 25 साल बाद दायर याचिका देरी के कारण खारिज की जानी चाहिए। वाराणसी विकास प्राधिकरण ने भी दावा किया कि याचिकाकर्ता ने जमीन पर अतिक्रमण कर निर्माण किया।
अभिलेखों की जांच के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 8(4) के तहत 20 मई 1982 को आदेश पारित कर दिया गया, जबकि धारा 8(3) का नोटिस 5 अगस्त 1982 को जारी हुआ था। यानी संबंधित नोटिस जारी होने से पहले ही आदेश पारित कर दिया गया। अदालत ने कहा कि मूल भूमिधर राम निहोर को उचित नोटिस दिए बिना पारित आदेश कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है।
जमीन के कब्जे के मुद्दे पर अदालत ने पाया कि धारा 10(5) के तहत कथित नोटिस पर कोई तारीख नहीं थी। राज्य के जवाबी हलफनामे और चुनौती दिए गए आदेश में भी यह नहीं बताया गया कि नोटिस कब जारी हुआ या कब तामील कराया गया। नोटिस पर न तो भूमिधर के हस्ताक्षर थे, न उनके प्रतिनिधियों के और न ही दो गवाहों के।
खंडपीठ ने कहा कि राज्य जमीन पर कब्जे का दावा केवल इसी बिना तारीख वाले नोटिस के आधार पर कर रहा है। अभिलेखों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह पता चले कि मूल भूमिधर या उनके कानूनी वारिसों ने जमीन का कब्जा कब और किस तरह अधिकारियों को सौंपा था।
अदालत ने विष्णु विजय भारती बनाम फखरुल हसन एवं अन्य और हरियाणा राज्य एवं अन्य बनाम अमीन लाल के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राजस्व अभिलेख अपने आप में जमीन के स्वामित्व का निर्णायक प्रमाण नहीं होते, लेकिन उनसे कब्जे के संबंध में अनुमान लगाया जा सकता है। इस मामले में कथित रूप से 1998 में कब्जा लिए जाने के बाद भी 23 साल से अधिक समय तक जमीन याचिकाकर्ता और उसके पूर्वजों के नाम दर्ज रही। इससे उनके पक्ष में कब्जे का अनुमान मजबूत होता है।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम हरिराम, एपी इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट कॉरपोरेशन बनाम तहसीलदार एवं अन्य और दलसुखभाई बचुभाई सतासिया एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य के फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने दोहराया कि धारा 10(5) और 10(6) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है और संबंधित नोटिस उस व्यक्ति को तामील कराया जाना चाहिए, जो जमीन के कब्जे में है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 10(3) के तहत जमीन का राज्य में निहित होना अपने आप में वास्तविक कब्जा मिलने के बराबर नहीं है। राज्य को यह साबित करना होगा कि जमीन का कब्जा स्वेच्छा से सौंपा गया, धारा 10(5) के तहत शांतिपूर्ण तरीके से लिया गया या धारा 10(6) के तहत बलपूर्वक कब्जा प्राप्त किया गया। इस मामले में न तो बलपूर्वक कब्जा लेने का प्रमाण था और न ही धारा 10(5) का नोटिस तामील होने का।
याचिका दायर करने में देरी की दलील पर अदालत ने कहा कि निरसन कानून लागू होने से पहले और उसके बाद भी याचिकाकर्ता जमीन पर कब्जे में बना रहा। राजस्व अभिलेखों में भी लगातार उसके परिवार के नाम दर्ज रहे। अदालत का दरवाजा तब खटखटाया गया, जब इन प्रविष्टियों को राज्य के नाम करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
खंडपीठ ने कहा,
“हमारा मानना है कि इस मामले में असली सवाल यह है कि क्या जमीन का वास्तविक कब्जा कभी प्रतिवादियों को सौंपा गया या नहीं, न कि यह कि याचिकाकर्ता ने अदालत का रुख करने में देरी की।”
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए सीलिंग वाद संख्या 486/2480/5523/81-82 की कार्यवाही को समाप्त घोषित किया। अदालत ने प्रतिवादी संख्या दो को राज्य के नाम दर्ज प्रविष्टियां हटाने और 20 सितंबर 2021 के आदेश से पहले राजस्व अभिलेखों में दर्ज स्थिति बहाल करने का निर्देश दिया।