इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि मऊ जिले के एक मदरसे को एक महीने के भीतर अनुदान सहायता सूची में शामिल करने के आदेश का पालन किया जाए। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय में अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग की प्रमुख सचिव संयुक्ता समद्दार को अवमानना के आरोप तय करने के लिए अदालत में उपस्थित होना होगा।

जस्टिस पीयूष अग्रवाल की पीठ मदरसा इस्लामिया सफीनतुल हिदाया की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह मदरसा मऊ जिले के मीरपुर रहीमाबाद में स्थित है। याचिका में आरोप लगाया गया कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के 25 नवंबर, 2020 के आदेश का पालन नहीं किया। उस आदेश में सरकार को मदरसे को 1 अप्रैल, 2021 से अनुदान सहायता सूची में शामिल करने का निर्देश दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस आदेश को राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दे चुकी है, लेकिन वहां से भी उसे कोई राहत नहीं मिली। इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि पिछली दो सुनवाइयों में भी सरकार की ओर से इसी तरह का अनुरोध किया गया, लेकिन ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो कि आदेश का पालन करने के लिए कोई गंभीर प्रयास किया गया।

कोर्ट जब संबंधित अधिकारी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की स्थिति में था तभी राज्य सरकार के वकील ने आदेश का पालन करने के लिए और समय मांगा। अदालत में मौजूद अधिकारी से मिले निर्देशों के आधार पर अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने स्पष्ट आश्वासन दिया कि एक महीने के भीतर आदेश का पालन कर दिया जाएगा।

इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को तय की। कोर्ट ने साफ किया कि यदि तब तक अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो प्रमुख सचिव को अवमानना के आरोप तय करने के लिए अदालत में उपस्थित रहना होगा।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने यह कहते हुए एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा कि मदरसे को अनुदान सूची में शामिल करने का प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष रखा जाना है। सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि 30 मई, 2022 के शासनादेश के जरिए मंत्रिपरिषद की मंजूरी से मदरसों को अनुदान सूची में शामिल करने की नीति समाप्त कर दी गई। इसलिए किसी नए मदरसे को अनुदान सूची में शामिल करने के लिए कैबिनेट की मंजूरी जरूरी होगी। हलफनामे में यह भी कहा गया कि संबंधित मदरसे को सूची में शामिल करने का प्रस्ताव मंत्रिपरिषद के समक्ष रखने की प्रक्रिया चल रही है।

हालांकि, हाईकोर्ट इस दलील से संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार करने वाली यही दलील पहले भी दी जा चुकी है और अदालत इसे खारिज कर चुकी है। कोर्ट ने 11 अप्रैल, 2022 के अपने आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि रिट कोर्ट के फैसले को कैबिनेट के विचार के अधीन नहीं किया जा सकता।

उस समय कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि रिट कोर्ट द्वारा जारी आदेश का पालन राज्य के अधिकारियों को करना होगा और उसका फैसला कैबिनेट के विचार का विषय नहीं बनाया जा सकता। हाईकोर्ट ने तब अंतिम अवसर देते हुए राज्य सरकार को दो सप्ताह का समय दिया था, ताकि वह आदेश का पालन करे और यह स्पष्ट करे कि मदरसे को अनुदान सूची में शामिल क्यों नहीं किया गया।

इसके बावजूद राज्य सरकार बाद की सुनवाइयों में प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष रखने की बात दोहराती रही। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने अब तक ऐसा कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं किया, जिससे आदेश के अनुपालन की दिशा में किए गए प्रयासों का पता चले।

यह अवमानना मामला मदरसा इस्लामिया सफीनतुल हिदाया के प्रबंधन की ओर से दाखिल मूल रिट याचिका से जुड़ा है। मदरसे ने राज्य सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अनुदान सहायता सूची में शामिल करने से इनकार कर दिया गया।

नवंबर 2020 के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सरकार के उस निर्णय को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने पाया था कि मदरसा अनुदान प्राप्त करने के लिए निर्धारित आवश्यक योग्यताएं पूरी करता है और उसके खिलाफ पहले उठाई गई तकनीकी आपत्तियां भी दूर कर दी गई थीं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब पात्र मदरसों को अनुदान सूची में शामिल करने की नीति समाप्त नहीं हुई, तब सरकार धन की कमी का हवाला देकर किसी पात्र संस्थान को इस लाभ से वंचित नहीं कर सकती। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मदरसे को 1 अप्रैल, 2021 से अनुदान सहायता सूची में शामिल करने का परमादेश जारी किया।

राज्य सरकार ने इस फैसले को खंडपीठ के समक्ष विशेष अपील के जरिए चुनौती दी, लेकिन 13 जुलाई, 2021 को अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की, जिसे 22 नवंबर, 2021 को खारिज कर दिया गया।

अब हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं होने के आरोप में दाखिल अवमानना याचिका पर अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।


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