यूपी स्पोर्ट्स कॉलेज सोसाइटी के शिक्षक 'लोक सेवक' नहीं, राज्य सेवा ट्रिब्यूनल में नहीं कर सकते अपील: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यूपी स्पोर्ट्स कॉलेज सोसाइटी द्वारा संचालित स्पोर्ट्स कॉलेजों के शिक्षक उत्तर प्रदेश लोक सेवा (ट्रिब्यूनल) अधिनियम, 1976 की धारा 2(बी) के तहत “लोक सेवक” नहीं हैं। इसलिए उनकी दावा याचिकाएं यूपी राज्य लोक सेवा ट्रिब्यूनल के समक्ष सुनवाई योग्य नहीं हैं।
1976 के अधिनियम की धारा 2(बी) में राज्य सरकार की सेवा में या उसके वेतन पर काम करने वाले व्यक्ति, छावनी बोर्ड के अलावा किसी स्थानीय प्राधिकरण के कर्मचारी और राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाले किसी अन्य निगम के कर्मचारी शामिल हैं।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा,
“सोसाइटी द्वारा संचालित स्पोर्ट्स कॉलेजों में काम करने वाले शिक्षक राज्य सरकार की सेवा में या उसके वेतन पर 'लोक सेवक' नहीं हैं। वे स्पोर्ट्स कॉलेजों के कर्मचारी हैं और उन्हें वित्तीय हैंडबुक, खंड 5, भाग 1 में शामिल नियम 369-ए के तहत कॉलेजों को मिलने वाली अनुदान सहायता से वेतन दिया जाता है। न तो यूपी स्पोर्ट्स कॉलेज सोसाइटी और न ही उसके द्वारा संचालित कॉलेज 'स्थानीय प्राधिकरण' के दायरे में आते हैं, क्योंकि उनका गठन नगरपालिका या स्थानीय मामलों के प्रबंधन के लिए स्थानीय स्वशासन या ग्राम प्रशासन की इकाई के रूप में नहीं किया गया। यह यूपी जनरल क्लॉजेस एक्ट, 1904 की धारा 4(25) में स्थानीय प्राधिकरण की परिभाषा के अनुरूप है।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“किसी वैधानिक ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र का विस्तार केवल सुविधा, समानता या नियोक्ता के सार्वजनिक स्वरूप के आधार पर नहीं किया जा सकता। उसका अधिकार क्षेत्र उसी कानून के स्पष्ट प्रावधानों से निर्धारित होना चाहिए, जिसके तहत उसका गठन किया गया।”
मामले में प्रतिवादी नंबर 2 को 1994 में स्पोर्ट्स कॉलेज, देहरादून में सहायक शिक्षक (फुटबॉल) नियुक्त किया गया। नियुक्ति को स्पोर्ट्स सोसाइटी के प्रबंधन बोर्ड ने मंजूरी दी थी। बाद में उनका तबादला गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज, लखनऊ में कर दिया गया और वे 30 अप्रैल 2023 को रिटायर हुए।
वेतन निर्धारण में विसंगतियां सामने आने के बाद उनका वेतन दोबारा निर्धारित किया गया और अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली का आदेश दिया गया। उन्होंने इन आदेशों को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। ट्रिब्यूनल ने 4 सितंबर 2025 को कॉलेज की ओर से याचिका की सुनवाई योग्य होने पर उठाई गई आपत्ति खारिज कर दी और उन्हें लोक सेवक माना।
कॉलेज के प्रिंसिपल ने हाईकोर्ट में दलील दी कि शिक्षकों की नियुक्ति सोसाइटी करती है और उनका वेतन अनुदान सहायता से दिया जाता है। इसलिए वे लोक सेवक नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रिटायर कर्मचारी की ओर से मांगी गई राहत अधिनियम की धारा 2(बीबी) के तहत “सेवा संबंधी मामला” नहीं है।
प्रतिवादी नंबर 2 ने इसके जवाब में कहा कि कॉलेजों को पूरी तरह राज्य सरकार से वित्तपोषण मिलता है।
हाईकोर्ट ने दूसरी आपत्ति खारिज करते हुए कहा कि वेतन निर्धारण सीधे सेवा की शर्तों से जुड़ा है। गलत वेतन निर्धारण एक निरंतर जारी रहने वाली चूक है, जिससे हर महीने नया कारण उत्पन्न होता है। यह सिद्धांत पेंशनभोगी पर भी समान रूप से लागू होता है।
कोर्ट ने गौर किया कि सोसाइटी सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत है। इसके प्रबंधन बोर्ड की अध्यक्षता खेल मंत्री करते हैं और बोर्ड में कॉलेज के प्रिंसिपल के अलावा सरकारी अधिकारी शामिल हैं। कॉलेज का प्रिंसिपल पदेन सचिव भी है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों से सोसाइटी का स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय का स्वरूप समाप्त नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि प्रबंधन बोर्ड कॉलेजों के बजट को मंजूरी देता है और शिक्षकों की नियुक्ति तथा उन्हें हटाने पर नियंत्रण रखता है। रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि प्रतिवादी नंबर 2 की नियुक्ति और पुष्टि सोसाइटी ने की थी।
कॉलेजों को अनुदान सहायता मिलती है। कोर्ट के अनुसार, वित्तीय हैंडबुक, खंड 5, भाग 1 के नियम 369-ए के तहत ऐसी सहायता केवल सरकार से स्वतंत्र और अलग कानूनी अस्तित्व रखने वाले निकाय को दी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
“इस कोर्ट की राय है कि शिक्षकों को स्पोर्ट्स कॉलेजों द्वारा वेतन दिया जाता है। ये कॉलेज सोसाइटी के प्रबंधन बोर्ड द्वारा संचालित और प्रबंधित होते हैं तथा सामान्य अनुदान सहायता नियमों के तहत राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान से उनका रखरखाव किया जाता है। ऐसे अनुदान केवल सरकार से स्वतंत्र और अलग कानूनी अस्तित्व रखने वाले व्यक्ति या निकाय को दिए जा सकते हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि शिक्षक राज्य सरकार के वेतन पर हैं।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सोसाइटी यूपी जनरल क्लॉजेस एक्ट, 1904 की धारा 4(25) के तहत “स्थानीय प्राधिकरण” नहीं है और न ही वह “निगम” है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इलाची देवी (डी) बाय एलआरएस एंड अदर्स बनाम जैन सोसाइटी, प्रोटेक्शन ऑफ ऑर्फन्स इंडिया एंड अदर्स फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि 1860 के अधिनियम के तहत पंजीकृत सोसाइटी निगम नहीं होती।
कोर्ट ने निष्कर्ष दिया,
“उपरोक्त के आधार पर यह निर्विवाद निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यूपी स्पोर्ट्स कॉलेज सोसाइटी, 1860 के अधिनियम के तहत पंजीकृत एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय है। इसके प्रबंधन बोर्ड में सरकारी अधिकारी होने के बावजूद यह 1976 के अधिनियम की धारा 2(बी) में उल्लिखित किसी भी श्रेणी में नहीं आती।”
इसके परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द किया और दावा याचिका संख्या 281/2025 की कार्यवाही खारिज की। हालांकि, प्रतिवादी नंबर 2 को अपनी शिकायत के निवारण के लिए किसी अन्य उपयुक्त मंच का रुख करने की स्वतंत्रता दी गई, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल करना भी शामिल है।
हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की।