प्रशासनिक प्रक्रिया को विफल होने से बचाने के लिए 'आवश्यकता के सिद्धांत' का सहारा लिया जा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'आवश्यकता का सिद्धांत' केवल पक्षपात की स्थिति में ही लागू नहीं होता, बल्कि ऐसी प्रशासनिक अपरिहार्यता में भी इसका सहारा लिया जा सकता है, जहां सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान प्रशासनिक प्रक्रिया ठप होने और पूरा प्रयास व्यर्थ हो जाने की आशंका हो।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के चेयरमैन द्वारा अकेले प्रधानाचार्य पद की चयन सूची घोषित किए जाने को वैध ठहराया। उस समय बोर्ड के अन्य सभी सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है।
कोर्ट ने कहा कि कानून कुछ ऐसे कार्यों की अनुमति आवश्यकता के आधार पर देता है, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में न्यायिक औचित्य की कसौटी पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। आवश्यकता के सिद्धांत को केवल उन मामलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, जहां किसी अधिकारी के पक्षपात के कारण वह निर्णय लेने के लिए अयोग्य हो जाता है। यदि प्रशासनिक आवश्यकता के कारण कोई प्रक्रिया अधूरी रह जाने और सार्वजनिक कार्य निष्फल होने की आशंका हो, तो उसे बचाने के लिए इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया जा सकता है।
मामले में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 4 के तहत बोर्ड में चेयरमैन और राज्य सरकार द्वारा नियुक्त दस सदस्य होने का प्रावधान है। अधिनियम की धारा 9(डी) चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करने का अधिकार और दायित्व बोर्ड को देती है। वहीं, वर्ष 1998 के संबंधित विनियमों के विनियम 4(6) के अनुसार, बैठक के लिए उस समय बोर्ड के कुल सदस्यों की आधी संख्या का कोरम आवश्यक है।
यह मामला वर्ष 2013 के विज्ञापन संख्या 3 से जुड़ा था, जिसके तहत बोर्ड ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए। संशोधित विज्ञापन के अनुसार आवेदन की अंतिम तारीख 25 फरवरी 2014 थी। हालांकि, मुकदमेबाजी के कारण चयन प्रक्रिया कई वर्षों तक अटकी रही।
एक जनवरी 2022 को जारी शुद्धिपत्र के माध्यम से चयन प्रक्रिया ऑनलाइन की गई और उम्मीदवारों को पोर्टल पर अपनी जानकारी सत्यापित करने तथा संस्थानों के लिए अपनी प्राथमिकताएं दर्ज करने को कहा गया। इसके लिए आठ जनवरी 2022 तक का समय दिया गया। दो जनवरी 2022 को जारी अन्य शुद्धिपत्र में आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख को पात्रता तय करने की तारीख माना गया। इस शुद्धिपत्र को भी अदालत में चुनौती दी गई थी, लेकिन मोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इसे मंजूरी मिल गई।
साक्षात्कार का कार्यक्रम 22 फरवरी 2022 को जारी किया गया और मार्च 2022 में साक्षात्कार आयोजित हुए। इसके बाद 11 और 13 नवंबर 2022 को अलग-अलग क्षेत्रों की चयन सूचियां प्रकाशित की गईं।
याचिकाकर्ता इंटरमीडिएट कॉलेजों के वरिष्ठतम प्रवक्ता थे, जो अपने-अपने संस्थानों में कार्यवाहक प्रधानाचार्य के रूप में काम कर रहे थे। वर्ष 1998 के नियमों के तहत संस्थान के प्रबंधन द्वारा उनके नाम बोर्ड को भेजे जाते हैं। संबंधित नियमों में यह भी प्रावधान है कि गुणवत्ता अंकों के आधार पर चुने गए उम्मीदवारों के अतिरिक्त संस्थान के दो वरिष्ठतम शिक्षकों को भी इंटरव्यू के लिए बुलाया जाए। सभी याचिकाकर्ता इंटरव्यू में शामिल हुए, लेकिन किसी का चयन नहीं हुआ।
प्रतिवादियों ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि चयन प्रक्रिया में बिना विरोध शामिल होने के बाद याचिकाकर्ता उसे चुनौती नहीं दे सकते। हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत उन दिशा-निर्देशों से जुड़ी है, जिन्हें खंडपीठ ने इंद्र राज सिंह यादव बनाम उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग मामले में मंजूरी दी। जब तक इस प्रश्न की जांच नहीं हो जाती, तब तक याचिकाकर्ताओं की याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज नहीं किया जा सकता।
चयन सूची घोषित करने की वैधता पर याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि बोर्ड बहुसदस्यीय निकाय है और वह केवल बैठक के माध्यम से काम कर सकता है। उनके अनुसार, एक व्यक्ति की बैठक नहीं हो सकती, इसलिए चेयरमैन द्वारा अकेले चयन सूची घोषित करना अधिनियम और विनियमों के विरुद्ध था। उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यकता का सिद्धांत तभी लागू हो सकता है, जब पक्षपात के कारण निर्णय लेने के लिए सक्षम सभी अधिकारी अयोग्य हो जाएं।
इसके विपरीत, आयोग और निजी प्रतिवादियों ने दीपक कुमार अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में समकक्ष पीठ के फैसले का हवाला दिया। उस मामले में बोर्ड में कोई अन्य सदस्य नियुक्त नहीं होने के दौरान चेयरमैन ने अकेले कार्य किया था। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि साक्षात्कार बोर्डों में सदस्य शामिल हुए और उनके आधार पर परिणाम घोषित करना केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता थी।
हाईकोर्ट ने माना कि विनियमों में बैठक के लिए कुल सदस्यों की आधी संख्या का कोरम निर्धारित है और चेयरमैन की अकेले बैठक का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। हालांकि, कानून या विनियमों में ऐसा कोई निषेध भी नहीं है, जो अन्य सदस्यों की नियुक्ति न होने पर चेयरमैन को बोर्ड के रूप में कार्य करने से रोकता हो।
कोर्ट ने कहा कि यदि आवश्यकता के सिद्धांत का इस्तेमाल नहीं किया जाता तो वर्ष 2013 में शुरू हुई और 2022 में पूरी करने की कोशिश की गई चयन प्रक्रिया व्यर्थ हो जाती, क्योंकि उस समय बोर्ड के अन्य सदस्य पद पर मौजूद नहीं थे। चेयरमैन द्वारा अकेले परिणाम घोषित करने को आवश्यकता के सिद्धांत के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत व्याख्या से राज्य के महत्वपूर्ण कार्यों में बाधा आ सकती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग के प्रशासनिक कर्मचारियों की मौजूदगी से पूरी चयन प्रक्रिया अमान्य नहीं हो जाती।
याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया में वरिष्ठतम शिक्षकों को प्राथमिकता देने संबंधी दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि प्रत्येक संस्थान के लिए गुणवत्ता अंकों की सूची में शीर्ष पांच उम्मीदवारों के साथ संस्थान के दो वरिष्ठतम शिक्षकों का साक्षात्कार होना चाहिए। यदि वरिष्ठतम शिक्षक इन सात उम्मीदवारों में सबसे ऊपर रहता तो उसका चयन किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं होने पर ही संस्थान को सीधे आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के लिए खोला जाना था।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, मौजूदा चयन प्रक्रिया में ऐसी सूची तैयार करने के बजाय सभी उम्मीदवारों की एक संयुक्त मेरिट सूची बनाई गई। इसके परिणामस्वरूप वरिष्ठतम शिक्षकों को चयन सूची में बहुत कम जगह मिली या वे पूरी तरह बाहर रह गए। अलीगढ़ मंडल में तो किसी भी वरिष्ठतम शिक्षक का चयन नहीं हुआ।
आयोग ने जवाब दिया कि पुराने दिशा-निर्देश वर्ष 1983 के नियमों में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए बनाए गए। उन नियमों में गुणवत्ता अंकों और साक्षात्कार के मानदंडों का स्पष्ट प्रावधान नहीं था। बाद में वर्ष 1995 और 1998 के नियमों में चयन की पूरी प्रक्रिया निर्धारित की गई। इन नियमों की वैधता को बालक सिंह कुशवाहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सुप्रीम कोर्ट तक गए बलबीर कौर बनाम उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड मामले में भी बरकरार रखा गया।
हाईकोर्ट ने आयोग की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि वर्ष 1998 के नियमों के नियम 12(8) के तहत प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक पदों के लिए चयन सूची संस्थानवार और मेरिट के क्रम में तैयार की जानी चाहिए। इसमें उम्मीदवार द्वारा किसी विशेष संस्थान के लिए दी गई प्राथमिकता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि गुणवत्ता अंकों की सूची के केवल शीर्ष पांच उम्मीदवारों तक चयन सूची सीमित करना वर्ष 1998 के नियम 12(8) के प्रावधानों के विपरीत होगा।
कोर्ट ने इस आशंका को भी खारिज किया कि वरिष्ठतम दो शिक्षकों के नाम भेजने का प्रावधान तभी अर्थहीन हो जाएगा, जब चयन केवल मेरिट के आधार पर होगा। उसने कहा कि वरिष्ठतम शिक्षकों की उम्मीदवारी पर विचार किया जाता है, भले ही वे संबंधित संस्थान के लिए अपनी प्राथमिकता दर्ज करें या नहीं। इसके अलावा, वे तीन संस्थानों की प्राथमिकता के आधार पर सीधे उम्मीदवार के रूप में भी आवेदन कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठतम प्रवक्ताओं को सीधे आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की तुलना में नियमों के विरुद्ध कोई अतिरिक्त प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। ऐसा करना वर्ष 1998 के नियमों के प्रावधानों के विपरीत होगा।
कोर्ट ने कहा कि इंद्र राज सिंह यादव मामले में जिन दिशा-निर्देशों पर विचार किया गया, वे वर्ष 1983 के नियमों के तहत हुई चयन प्रक्रिया से संबंधित थे, जबकि मौजूदा मामला वर्ष 1998 के नियमों के अंतर्गत आता है। इसलिए याचिकाकर्ताओं की चुनौती स्वीकार नहीं की जा सकती और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाओं के पहले समूह में शामिल उम्मीदवार 25 फरवरी 2014 को आवेदन की अंतिम तारीख पर पात्र नहीं थे, इसलिए उन्हें चयन सूची को चुनौती देने का अधिकार नहीं था। उनके वकील ने इस आपत्ति का खंडन नहीं किया। दूसरे समूह के याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान रिटायरमेंट की आयु पूरी हो गई। प्रतिवादियों की ओर से पेश न्यायिक फैसलों के अनुसार, उन्हें पद पर बने रहने या बाद में नियुक्ति पाने का कोई निहित अधिकार नहीं था।
इन सभी निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाओं के पूरे समूह को खारिज किया। साथ ही निर्देश दिया कि वर्ष 2013 में शुरू की गई चयन प्रक्रिया को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।