जब्त वाहन पुलिस छापेमारी के लिए थाने से निकाला, तीन दिन बाद हादसे में महिला की मौत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP को जांच के आदेश दिए
Amir Ahmad
25 Sept 2026 2:15 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आबकारी मामले में जब्त किए गए वाहन को पुलिस हिरासत से निकालकर छापेमारी में इस्तेमाल किए जाने और इसके कुछ दिन बाद जानलेवा हादसे में शामिल होने की परिस्थितियों की स्वतंत्र और गोपनीय जांच का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के DGP को आठ सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
जस्टिस अनिल कुमार की पीठ ने कहा कि जब्त वाहन को पुलिस हिरासत से बाहर निकालने और उसके बाद हुए हादसे की परिस्थितियां गंभीर सवाल खड़े करती हैं। हालांकि अदालत ने वाहन की जब्ती और कुर्की को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। पीठ ने जिला मजिस्ट्रेट और अपीलीय अदालत के आदेशों में कोई अवैधता या गंभीर त्रुटि नहीं पाई।
मामला बुलंदशहर में एक महिंद्रा एक्सयूवी की जब्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता राहुल उर्फ धर्मदेव पर 19 पेटी देशी शराब ले जाने का आरोप था। उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम की धाराओं 60 और 63 के तहत FIR दर्ज की गई। इसके बाद वाहन जब्त कर लिया गया और आबकारी अधिनियम की धारा 72 के तहत उसकी कुर्की की कार्रवाई शुरू हुई।
जिला मजिस्ट्रेट ने बाद में वाहन को कुर्क करते हुए उसका बाजार मूल्य 6.45 लाख रुपये आंका था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को अपीलीय अदालत में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि जब्त वाहन को 4 जून 2021 को रामघाट थाने से बाहर ले जाया गया।
राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि तत्कालीन हेड मुहर्रिर सीताराम ने कथित तौर पर दो सिपाहियों पंकज राणा और नरेंद्र सिंह को वांछित आरोपी की तलाश के लिए वाहन उपलब्ध कराया था। यह काम तत्कालीन थाना प्रभारी वीरेंद्र सिंह की जानकारी के बिना किए जाने का दावा किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस समय वाहन पुलिस के कब्जे में था और उसकी कुर्की की कार्रवाई लंबित थी, उस समय उसे पुलिस हिरासत से बाहर निकालने की परिस्थितियों की जांच जरूरी है। अदालत ने कहा कि यदि वाहन को बिना वैध अधिकार के पुलिस हिरासत से निकाला गया तो यह उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे पुलिसकर्मियों के कर्तव्य का गंभीर उल्लंघन होगा।
वाहन 7 जून 2021 को एक हादसे का शिकार हुआ। हादसे में मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मां की मौत हो गई। इसके बाद मथुरा के राया थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 279, 338 और 304-ए के तहत FIR दर्ज की गई और वाहन को उस मामले में भी जब्त कर लिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन को थाने से बाहर ले जाने के संबंध में राज्य की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने कहा कि जब वाहन पहले ही जब्त किया जा चुका था और उसकी कुर्की की कार्रवाई लंबित थी तब पुलिसकर्मी उसकी हिरासत के साथ मनमाने तरीके से व्यवहार नहीं कर सकते।
राज्य ने अदालत को बताया कि हेड मुहर्रिर और दोनों सिपाहियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई और तीनों के सेवा रिकॉर्ड में निंदा प्रविष्टि की गई। हाईकोर्ट ने मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए प्रथम दृष्टया इस कार्रवाई को पर्याप्त नहीं माना।
अदालत ने कहा कि यदि आरोप साबित होते हैं तो यह केवल प्रक्रिया संबंधी चूक का मामला नहीं होगा बल्कि जब्त वाहन को कथित तौर पर बिना अधिकार बाहर निकालने, सौंपी गई हिरासत का उल्लंघन करने और ऐसे आचरण का मामला होगा, जिसके बाद वाहन एक जानलेवा हादसे में शामिल हुआ।
हाईकोर्ट ने DGP को यह जांचने का निर्देश दिया कि वाहन को थाने से कैसे बाहर निकाला गया और इसमें हेड मुहर्रिर, दोनों सिपाहियों तथा तत्कालीन थाना प्रभारी की क्या भूमिका थी।
जांच में हादसे की परिस्थितियों, पहले की गई विभागीय कार्रवाई की निष्पक्षता और पर्याप्तता तथा तत्कालीन बुलंदशहर SSP की भूमिका की भी जांच की जाएगी। इसके अलावा, यह भी देखा जाएगा कि मामले के तथ्यों से प्रथम दृष्टया किसी आपराधिक अपराध का पता चलता है या नहीं और ऐसी स्थिति में FIR दर्ज करने या कानून के तहत आगे की कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं।
अदालत ने विशेष रूप से यह जांच करने को कहा है कि कथित कृत्य चोरी, आपराधिक दुर्विनियोग, आपराधिक न्यासभंग या लागू कानून के किसी अन्य अपराध के दायरे में आता है या नहीं।
DGP को वाहन की वर्तमान स्थिति, उसका पता और मथुरा में दर्ज बाद के मामले में उसकी कानूनी स्थिति की भी जांच करने का निर्देश दिया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर किसी भी पुलिसकर्मी की आपराधिक जिम्मेदारी को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया जा रहा है। जांच का उद्देश्य तथ्यों का पता लगाना और कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय करना है।
हाईकोर्ट ने वाहन की कुर्की के खिलाफ याचिका खारिज करते हुए पुलिस कार्रवाई से जुड़े इन पहलुओं की स्वतंत्र जांच का आदेश दिया।

