तबादला नीति केवल मार्गदर्शक, कानूनन लागू नहीं; राज्य को किसी कर्मचारी का तबादला करने का निर्देश नहीं दे सकती अदालत: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

9 Jan 2026 7:08 PM IST

  • तबादला नीति केवल मार्गदर्शक, कानूनन लागू नहीं; राज्य को किसी कर्मचारी का तबादला करने का निर्देश नहीं दे सकती अदालत: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा जारी की गई तबादला नीति केवल मार्गदर्शन के लिए होती है। इसे अदालत के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी का स्थानांतरण और पदस्थापना पूरी तरह से राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय राज्य को किसी विशेष कर्मचारी को किसी विशेष स्थान पर स्थानांतरित करने का निर्देश नहीं दे सकता।

    जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने बुधवार को एक रिट याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका के जरिए राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की गई कि वह एक सरकारी अधिकारी का दूसरे जिले में तबादला करे।

    खंडपीठ ने कहा कि सरकारी सेवकों के तबादले और पोस्टिंग का निर्णय राज्य सरकार विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक हित और प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर करती है। अदालत केवल उसी स्थिति में हस्तक्षेप कर सकती है, जब यह स्पष्ट रूप से दिखाया जाए कि तबादला आदेश दुर्भावना से ग्रस्त है या किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करता है।

    मामले के संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि फुल चंद्रा नामक याचिकाकर्ता ने सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) के तबादले की मांग को लेकर रिट याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि संबंधित अधिकारी वर्ष 1997 से जिला उन्नाव में ही कार्यरत है और लंबे समय से विकास खंड सफीपुर में तैनात रहने के कारण उसने कथित तौर पर ग्राम विकास के लिए आवंटित सरकारी धन का दुरुपयोग किया।

    याचिकाकर्ता ने मई, 2025 में जारी राज्य सरकार की तबादला नीति का हवाला देते हुए कहा कि किसी जिले में सात वर्ष से अधिक समय तक पदस्थापित रहने वाले सरकारी कर्मचारी का तबादला किया जाना चाहिए। चूंकि संबंधित अधिकारी दशकों से उसी जिले में कार्यरत है, इसलिए राज्य सरकार पर उसे स्थानांतरित करने का दायित्व बनता है।

    वहीं, राज्य सरकार की ओर से याचिका की पोषणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई। राज्य के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता यह नहीं बता पाया कि संबंधित अधिकारी के तबादले न होने से वह व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि तबादला नीति केवल मार्गदर्शक सिद्धांतों का संग्रह है। इसे रिट याचिका के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता, विशेषकर तब जब याचिकाकर्ता का उस कर्मचारी की सेवा शर्तों से कोई प्रत्यक्ष सरोकार न हो।

    राज्य ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारी का कैडर प्रारंभ में ब्लॉक स्तर का था, जिसके कारण उसकी तैनाती विकास खंडों में की गई। प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार उसे समय-समय पर विभिन्न विकास खंडों में स्थानांतरित किया गया।

    दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई तीसरा व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी के तबादले के लिए रिट क्षेत्राधिकार का सहारा नहीं ले सकता। अदालत ने यह भी माना कि यदि संबंधित अधिकारी के खिलाफ कोई शिकायत है, तो सक्षम प्राधिकारी उन पर विचार कर सकता है, लेकिन केवल गैर-तबादले के आधार पर कोई बाहरी व्यक्ति अदालत में याचिका दायर नहीं कर सकता।

    तबादला नीति के मुद्दे पर कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य सरकार द्वारा जारी की गई नीति केवल प्रशासनिक मार्गदर्शन के लिए होती है। इसके प्रावधानों को अदालत के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जिनमें यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एस.एल. अब्बास और शिल्पी बोस बनाम बिहार राज्य शामिल हैं, उसका हवाला देते हुए कहा कि जब तक तबादला आदेश दुर्भावना से ग्रस्त न हो या किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन न करता हो, तब तक न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

    इन आधारों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह राज्य सरकार को किसी सरकारी कर्मचारी का किसी विशेष स्थान पर तबादला करने का निर्देश नहीं दे सकती।

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