गवाह बुलाने के लिए शिकायतकर्ता भी दे सकता है आवेदन: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी की आपत्ति खारिज की
Amir Ahmad
15 April 2026 5:31 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य मामलों में भी शिकायतकर्ता CrPC की धारा 311 (BNSS की धारा 348) के तहत अदालत से गवाह बुलाने या दस्तावेज प्रस्तुत कराने की मांग कर सकता है। इसके लिए लोक अभियोजक द्वारा आवेदन देना अनिवार्य नहीं है।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह फैसला देते हुए आरोपी की याचिका खारिज की, जिसमें ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामला लखनऊ सेशन कोर्ट में चल रहे हत्या के मुकदमे से जुड़ा है। यहां शिकायतकर्ता ने अभियोजन साक्ष्य बंद होने और आरोपी का बयान दर्ज होने के बाद आवेदन देकर कुछ दस्तावेजों को साक्ष्य के रूप में प्रदर्शित करने और अतिरिक्त गवाहों को बुलाने की मांग की थी।
इन दस्तावेजों में गूगल सर्च हिस्ट्री, व्हाट्सएप चैट और मीडिया बयान शामिल थे, जो पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद थे। साथ ही शिकायतकर्ता ने आरोपी की बहन और एक पड़ोसी को गवाह के रूप में बुलाने की मांग की थी ताकि घटना के समय आरोपी की मानसिक स्थिति स्पष्ट की जा सके।
आरोपी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि दस्तावेज प्रमाणित नहीं हैं और शिकायतकर्ता को ऐसा आवेदन देने का अधिकार नहीं है। उसने यह भी तर्क दिया कि राज्य मामलों में केवल लोक अभियोजक ही ऐसा आवेदन दे सकता है।
ट्रायल कोर्ट ने आवेदन स्वीकार करते हुए कहा था कि इस चरण पर दस्तावेजों की विश्वसनीयता या प्रमाणिकता का मूल्यांकन नहीं किया जाता बल्कि यह देखा जाता है कि वे न्याय के लिए आवश्यक हैं या नहीं।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस दृष्टिकोण को सही ठहराते हुए कहा कि धारा 311 का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है और अदालत इस शक्ति का प्रयोग किसी भी स्तर पर कर सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“यह नहीं कहा जा सकता कि अदालत को यह शक्ति केवल स्वयं संज्ञान लेने पर ही प्रयोग करनी है या इसके लिए लोक अभियोजक का आवेदन अनिवार्य है। शिकायतकर्ता भी अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित कर सकता है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक आवेदन न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं करता और न्याय सुनिश्चित करने में सहायक है तब तक उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की याचिका खारिज की और ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।

