पहले अर्जी खारिज होने के बाद भी आरोप बढ़ाने की दूसरी अर्जी पर सुनवाई संभव: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
28 Oct 2026 12:53 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट पहले अर्जी खारिज होने के बावजूद दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के तहत आरोप में बदलाव करने या नया आरोप जोड़ने की दूसरी अर्जी पर विचार कर सकता है। हालांकि यह शक्ति ट्रायल कोर्ट के फैसला सुनाने से पहले तक ही इस्तेमाल की जा सकती है।
जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी आरोपी की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर अर्जी खारिज करते हुए की। आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसके खिलाफ हत्या के प्रयास यानी IPC की धारा 307 के तहत अतिरिक्त आरोप जोड़ा गया था।
मामले के अनुसार 19 मई 2021 को बस्ती जिले के एक थाने में FIR दर्ज कराई गई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने उस पर लाठियों से हमला किया और उनमें से एक ने गोली चलाई। बीच-बचाव करने आए एक अन्य व्यक्ति के साथ भी मारपीट किए जाने का आरोप था।
जांच के बाद पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया। इसके आधार पर पांच आरोपियों को IPC की धाराओं 147, 323, 504 और 506 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया गया।
शिकायतकर्ता ने 8 अगस्त 2022 को CrPC की धारा 216 के तहत पहली अर्जी दाखिल कर IPC की धारा 307 जोड़ने की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2022 में यह कहते हुए अर्जी खारिज की कि उस समय मांग समय से पहले थी। इसके बाद 22 सितंबर 2022 को आरोप तय किए गए और मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई।
ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता एक अन्य घायल गवाह और घायलों की जांच करने वाले डॉक्टर के बयान दर्ज किए गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने 16 मार्च 2023 को दोबारा अर्जी दाखिल कर हत्या के प्रयास का आरोप जोड़ने की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने 4 जून 2026 को दूसरी अर्जी स्वीकार करते हुए IPC की धारा 307 के तहत अतिरिक्त आरोप जोड़ दिया।
आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जब इसी राहत के लिए पहली अर्जी पहले ही खारिज हो चुकी थी तो नई अर्जी स्वीकार नहीं की जा सकती। उसने यह भी कहा कि दूसरी अर्जी के समर्थन में कोई नया तथ्य या पर्याप्त साक्ष्य नहीं था।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि डॉक्टर ने शिकायतकर्ता की बाईं जांघ पर गोली लगने से हुई चोट का उल्लेख किया। शिकायतकर्ता ने भी ट्रायल के दौरान गोली लगने की बात कही थी। कोर्ट ने माना कि हत्या के प्रयास का आरोप जोड़ने के लिए प्रथम दृष्टया सामग्री उपलब्ध थी।
जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने कहा कि CrPC की धारा 216 ट्रायल कोर्ट को फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोप बदलने या नया आरोप जोड़ने का अधिकार देती है। दूसरी अर्जी पर विचार किया जा सकता है या नहीं, यह मुकदमे की अवस्था पर निर्भर करेगा, क्योंकि यह शक्ति फैसला सुनाए जाने तक उपलब्ध रहती है।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता या गंभीर त्रुटि नहीं है जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए। इसके साथ ही आरोपी की अर्जी खारिज की गई और हत्या के प्रयास का अतिरिक्त आरोप जोड़ने का आदेश बरकरार रखा गया।

