धारा 161 के बयान में चूक से गवाह को तभी किया जा सकता है अविश्वसनीय, जब जांच अधिकारी उसे साबित करे: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
9 July 2026 6:51 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी गवाह के पुलिस के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत दिए गए बयान में हुई चूक के आधार पर उसे तभी अविश्वसनीय ठहराया जा सकता है, जब उस चूक को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच अधिकारी साबित करे। केवल अदालत में गवाह का पुलिस बयान से सामान्य रूप से सामना करा देने से साक्ष्य अधिनियम की धारा 145 और CrPC की धारा 162 की कानूनी आवश्यकता पूरी नहीं होती।
जस्टिस जे. जे. मुनिर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए तिल्लूका उर्फ मनोज की अपील खारिज करते हुए की।
अदालत ने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
मामला
अभियोजन के अनुसार 2 जुलाई 2015 को मृतका सत्यवती ने आरोपी तिल्लूका उर्फ मनोज से उधार दिए गए रुपये वापस मांगे। इस पर आरोपी नाराज होकर धमकी देता हुआ वहां से चला गया। करीब आधे घंटे बाद वह वापस लौटा, उसने सत्यवती पर मिट्टी का तेल डालकर माचिस से आग लगा दी।
गंभीर रूप से झुलसी सत्यवती का उसी दिन एडिशनल सिटी मजिस्ट्रेट ने मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया। इलाज के दौरान जलने से हुए घावों के कारण सेप्टीसीमिक शॉक से उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मामले को हत्या में परिवर्तित कर जांच अधिकारी ने आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया।
मुकदमे के दौरान अभियोजन के गवाह अवरन सिंह ने अदालत को बताया कि शोर सुनकर वह घटनास्थल पर पहुंचे, जहां उन्होंने सत्यवती को आग की लपटों में घिरा देखा। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने आरोपी को वहां देखा और सत्यवती लगातार चिल्लाकर कह रही थी कि तिल्लूका ने उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई।
जिरह के दौरान बचाव पक्ष ने गवाह के धारा 161 के बयान का हवाला देते हुए कहा कि उसने पुलिस को यह बात नहीं बताई थी कि उसने मृतका को आरोपी का नाम लेते हुए सुना था। इस पर गवाह ने कहा कि उसने पुलिस को यह तथ्य बताया, लेकिन यदि पुलिस ने उसे दर्ज नहीं किया तो वह इसका कारण नहीं बता सकता।
ट्रायल कोर्ट ने इस कथित चूक के आधार पर गवाह की विश्वसनीयता पर संदेह जताया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे कानून के विपरीत माना।
खंडपीठ ने अपने 23 पृष्ठों के फैसले में साक्ष्य अधिनियम की धारा 145 और CrPC की धारा 162 के तहत गवाह के पूर्व बयान से विरोधाभास साबित करने की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट की।
अदालत ने तहसीलदार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959) तथा विनोद कुमार बनाम दिल्ली राज्य (2025) के फैसलों का भी उल्लेख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि सबसे पहले ट्रायल कोर्ट को गवाह के पूर्व बयान के उस हिस्से को चिह्नित करना होगा, जिससे विरोधाभास साबित किया जाना है। इसके बाद वही हिस्सा गवाह के सामने रखा जाएगा।
यदि गवाह उस चूक को स्वीकार कर लेता है तो वह हिस्सा सिद्ध माना जाएगा और विरोधाभास के लिए उसका उपयोग किया जा सकेगा। लेकिन यदि गवाह यह कहे कि उसने पुलिस को वह बात बताई थी और पुलिस ने उसे दर्ज नहीं किया, तो उस स्थिति में संबंधित जांच अधिकारी को अदालत में आकर यह साबित करना होगा कि वास्तव में वह बात बयान में नहीं कही गई थी।
खंडपीठ ने कहा,
"गवाह का अदालत में केवल पुलिस के समक्ष दिए गए बयान से सामान्य रूप से सामना करा देना CrPC की धारा 162 के प्रावधान का पालन नहीं माना जा सकता। जब तक जांच अधिकारी उस चूक को विधि के अनुसार साबित नहीं करता, तब तक गवाह को अविश्वसनीय नहीं ठहराया जा सकता।"
अदालत ने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी से कथित चूक को साबित ही नहीं कराया गया। इसलिए गवाह की अदालत में दी गई गवाही पूरी तरह स्वीकार्य और विश्वसनीय बनी रही।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मृतका का मृत्यु पूर्व बयान पूरी तरह विश्वसनीय है और घटनास्थल पर पहुंचे गवाहों की गवाही भी भरोसेमंद है। इन सभी साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने तिल्लूका उर्फ मनोज की हत्या के मामले में दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।


