दूसरी पत्नी द्वारा IPC की धारा 498A के तहत कार्यवाही सुनवाई योग्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया

  • दूसरी पत्नी द्वारा IPC की धारा 498A के तहत कार्यवाही सुनवाई योग्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया कि दूसरी पत्नी द्वारा IPC की धारा 498-A के तहत कार्यवाही सुनवाई योग्य नहीं।

    जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने शिवचरण लाल वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य 2002, शिवकुमार और अन्य बनाम राज्य और अखिलेश केशरी और 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले पर भरोसा करते हुए यह टिप्पणी की।

    एकल न्यायाधीश ने मान सिंह और 2 अन्य द्वारा धारा 482 CrPC की याचिका को अनुमति दी, जिसमें सीजेएम कौशांबी की अदालत में लंबित धारा 498 A, 323, 504, 506 IPC और 3/4 डी.पी. अधिनियम के तहत शिकायत मामले की कार्यवाही को चुनौती दी गई थी।

    संक्षेप में मामला

    शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आवेदक नंबर 1 (मान सिंह) और विपक्षी नंबर 2 के बीच अप्रैल 2012 में विवाह हुआ था। शुरू में चार साल तक कोई विवाद नहीं हुआ।

    हालांकि, इस अवधि के बाद सिंह ने कथित तौर पर प्राप्त उपहारों से असंतुष्टि व्यक्त करते हुए दहेज के लिए विपक्षी नंबर 2 को परेशान करना शुरू कर दिया।

    इसके बाद चूंकि उसके पिता ने समझौता कराने में मदद की इसलिए वे साथ रहने लगे। हालांकि शिकायत के अनुसार अक्टूबर 2016 में आवेदकों ने उसे एक कार में जबरन बिठाया और उसे अपने मायके से 2 लाख रुपये और एक कार लाने को कहा।

    उसने मामले की सूचना पुलिस को दी। हालांकि जब कोई कार्रवाई नहीं की गई तो उसने आईपीसी और डी.पी. अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत तत्काल शिकायत दर्ज कराई।

    धारा 200 CrPC के तहत दर्ज अपने बयान में विपरीत पक्ष संख्या 2 ने आरोप लगाया कि आवेदक संख्या 2 आवेदक नंबर 1 की पहली पत्नी थी कि वह उसके साथ उसी घर में रहती थी और उनकी शादी के समय,

    आवेदक नंबर 1 ने गलत बयान दिया था कि उसकी पहली पत्नी की मृत्यु हो गई। उसने उस समय इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि उसका मानना ​​था कि वे सभी एक साथ रह सकते हैं।

    हाईकोर्ट के समक्ष पूरे शिकायत मामले को चुनौती देते हुए आवेदकों ने यह तर्क देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया कि चूंकि विपक्षी पक्ष नंबर 2 ने स्वीकार किया कि वह आवेदक की दूसरी पत्नी है, इसलिए वह धारा 498 A आईपीसी के तहत अपराधों के लिए आवेदक के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने के लिए सक्षम नहीं है।

    जहां तक ​​दहेज की मांग और प्रताड़ना के आरोपों का सवाल है, यह तर्क दिया गया कि शादी के चार साल तक दहेज या उत्पीड़न की कोई मांग नहीं की गई थी। उसके बाद दहेज की मांग के बारे में आरोप लगाए गए।

    यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि विपक्षी पक्ष नंबर 2 का आवेदक नंबर के साथ विवाह हुआ था। 1 निस्संदेह अमान्य है। इसलिए इस मामले में न तो धारा 498ए आईपीसी के तहत अपराध और न ही धारा 3/4 दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत अपराध लगेगा।

    दूसरी ओर राज्य की ओर से पेश AGA ने तर्क दिया कि चूंकि शिकायत में आरोप लगाया गया कि सभी आवेदकों ने उसके साथ शारीरिक रूप से मारपीट की। इसलिए धारा 323, 504 और 506 IPC के तहत आरोप बनाए रखने योग्य हैं। हालांकि उसने यह भी स्वीकार किया कि चूंकि यह दूसरी शादी है, इसलिए धारा 498A IPC और दहेज निषेध अधिनियम के तहत आरोप लागू नहीं होते।

    पक्षों के वकीलों द्वारा किए गए प्रतिद्वंद्वी प्रस्तुतियों को सुनने के बाद न्यायालय ने नोट किया कि चूंकि विपरीत पक्ष नंबर 2 आवेदक संख्या 1 की दूसरी पत्नी है, इसलिए उसके कहने पर दायर की गई शिकायत बनाए रखने योग्य नहीं है।

    जहां तक ​​धारा 3/4 डी.पी. अधिनियम के तहत कार्यवाही का संबंध है, न्यायालय ने नोट किया कि पूरी शिकायत में, दहेज की मांग के जो आरोप लगाए गए, जो न तो दिया गया और न ही देने पर सहमति हुई है। इसलिए डी.पी. अधिनियम के तहत आरोप भी आकर्षित नहीं होते हैं।

    जहां तक ​​उत्पीड़न और यातना के आरोपों का सवाल है, न्यायालय ने नोट किया कि कोई विशिष्ट आरोप नहीं था और केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप विपरीत पक्ष संख्या द्वारा लगाए गए थे। 2 बिना किसी विशेष मुद्दे के वास्तव में किसने और कब विपक्षी पक्षकार संख्या 2 पर हमला किया था। इसलिए न्यायालय ने राय दी कि धारा 323, 504, 506 आईपीसी के तहत अपराध भी तत्काल मामले में आकर्षित नहीं होते।

    इसके मद्देनजर याचिका को अनुमति दी गई और शिकायत मामला रद्द कर दिया गया।

    केस टाइटल- मान सिंह और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

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