समय से पहले रिहाई का फैसला सिर्फ जेल के आचरण से नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार को दिया समग्र दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश

Amir Ahmad

15 Sept 2026 4:49 PM IST

  • समय से पहले रिहाई का फैसला सिर्फ जेल के आचरण से नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार को दिया समग्र दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी उम्रकैद की सजा पाए कैदी की समय से पहले रिहाई पर विचार करते समय सरकार केवल अपराध की प्रकृति और जेल में उसके आचरण तक अपना निर्णय सीमित नहीं कर सकती। सरकार को कैदी के सुधार, उसके सामाजिक पुनर्वास और समाज में दोबारा शामिल होने की संभावनाओं से जुड़े व्यापक पहलुओं पर समग्र रूप से विचार करना होगा।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें दो दशक से अधिक समय जेल में बिता चुके उम्रकैद के कैदी की समय से पहले रिहाई की अर्जी सरकार ने खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने सरकार का आदेश रद्द करते हुए मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया और कहा कि एक महीने के भीतर कानून के अनुसार नया फैसला लिया जाए।

    मामले के अनुसार, आदिल उर्फ सीरान को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने 2018 में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी और सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी थी। वह 8 दिसंबर 2005 से लगातार जेल में बंद है और उसे पैरोल भी नहीं मिली।

    अगस्त 2025 में राज्यपाल ने उसकी समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज की थी। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।

    अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश में समय से पहले रिहाई के लिए कई व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इनमें उत्तर प्रदेश कैदियों की परिवीक्षा पर रिहाई अधिनियम, 1938, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 और उत्तर प्रदेश जेल नियमावली के तहत नाममात्र सूची के आधार पर रिहाई, बीमारी, वृद्धावस्था या गंभीर बीमारी के आधार पर रिहाई तथा संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत रिहाई शामिल है।

    मौजूदा मामले में अदालत ने पाया कि कैदी की अर्जी मूल रूप से CrPC की धारा 432 और उत्तर प्रदेश जेल नियमावली के पैराग्राफ 180 के तहत नाममात्र सूची के आधार पर रिहाई से संबंधित है। इसलिए इस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लक्ष्मण नस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में तय सिद्धांतों के अनुसार विचार किया जाना चाहिए।

    इन सिद्धांतों के तहत यह देखा जाना जरूरी है कि अपराध व्यक्तिगत प्रकृति का है या उसका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा, भविष्य में अपराध दोहराने की संभावना है या नहीं, कैदी की अपराध करने की क्षमता खत्म हुई है या नहीं, उसे और जेल में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य है या नहीं तथा उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है।

    हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार का फैसला मुख्य रूप से अपराध की प्रकृति और जेल में कैदी के आचरण पर आधारित है। अदालत ने कहा कि दोषी ठहराने वाले जज की रिपोर्ट में कैदी के जेल में रहने के दौरान अनुशासन से जुड़े नौ मामलों का उल्लेख है। हालांकि, इन सभी मामलों में आक्रामक व्यवहार नहीं है और कुछ मामले जेल अनुशासन के उल्लंघन या अनधिकृत वस्तुओं के कब्जे से संबंधित है।

    अदालत ने कहा कि जेल में हुए अपराधों की रिपोर्ट को आधार बनाकर समय से पहले रिहाई पर विचार के लिए जरूरी “कहीं व्यापक” पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा लक्ष्मण नस्कर मामले में बताए गए सभी जरूरी कारकों पर विचार नहीं किया।

    खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के राजो उर्फ राजवा उर्फ राजेंद्र मंडल बनाम बिहार राज्य के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकार को रिहाई से जुड़े विभिन्न विचारों और रिपोर्टों का समग्र मूल्यांकन करने की जरूरत पर जोर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि फैसला केवल अपराध पर केंद्रित नहीं होना चाहिए, बल्कि दोषी व्यक्ति और दोषसिद्धि के बाद उसके आचरण पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार का दृष्टिकोण “कहीं अधिक व्यापक और समग्र” होना चाहिए। इसमें कैदी के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू, लंबे समय तक जेल में रहना, परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, उसे और जेल में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य बचा है या नहीं और समाज में उसके पुनर्वास की संभावना जैसे पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।

    अदालत ने यह भी कहा कि जेल के कठिन और तनावपूर्ण माहौल में किए गए अपराधों के आधार पर रिहाई के बाद कैदी के संभावित व्यवहार के बारे में निष्कर्ष निकालने पर भी विचार किया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर सरकार कैदी का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन भी करा सकती है ताकि रिहाई के बाद उसके व्यवहार की संभावनाओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि समय से पहले रिहाई पर अंतिम निर्णय तक पहुंचने के लिए जिन कारकों पर विचार किया जाना चाहिए, उनका दायरा कैदी के जेल में आचरण संबंधी जज की टिप्पणियों से कहीं अधिक व्यापक है।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज करने वाला आदेश रद्द किया और सरकार को कैदी के मामले पर नए सिरे से विचार कर एक महीने के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

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