पत्नी को जिंदा जलाकर दरवाजा बाहर से बंद करना हत्या की मंशा का स्पष्ट प्रमाण: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखी दोषसिद्धि
Amir Ahmad
16 Jun 2026 6:55 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर ऐसी चोट पहुंचाई हो जो स्वाभाविक रूप से मृत्यु का कारण बन सकती है, तो केवल इस आधार पर हत्या का अपराध कम नहीं हो जाता कि पीड़ित की मौत कुछ दिनों बाद संक्रमण (सेप्टीसीमिया) के कारण हुई।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने आठ माह की गर्भवती पत्नी को मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जलाने वाले पति की हत्या के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
हालांकि, अदालत ने सुधारात्मक न्याय के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए आजीवन कारावास की सजा घटाकर 20 वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित की।
अदालत ने कहा कि यदि यह साबित हो जाए कि आरोपी द्वारा पहुंचाई गई चोटें सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थीं और वही चोटें जानबूझकर दी गई थीं, तो बाद में सेप्टीसीमिया होने से अपराध की प्रकृति नहीं बदलती। ऐसे मामलों में आरोपी भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी रहेगा।
मामला
28 नवंबर 2010 को 20 वर्षीय रुचि, जो आठ माह की गर्भवती थी गंभीर रूप से झुलसी अवस्था में सीतापुर जिला अस्पताल में भर्ती कराई गई थी। कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज मृत्युपूर्व बयान में उसने बताया कि डेढ़ साल के बेटे के मुंह के छालों के इलाज के लिए पैसे मांगने पर उसके पति मनीष ने पहले उसके साथ मारपीट की।
इसके बाद आरोपी उसे घर के अंदर ले गया, उसके ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी और उसकी मौत सुनिश्चित करने के लिए बाहर से दरवाजा बंद कर दिया। 23 दिन बाद रुचि की सेप्टीसीमिया के कारण मृत्यु हो गई, जबकि गर्भस्थ शिशु की भी जान चली गई।
अदालत ने कहा कि आरोपी का आचरण उसकी स्पष्ट हत्या की मंशा को दर्शाता है। विशेष रूप से पत्नी को आग लगाने के बाद बाहर से दरवाजा बंद कर देना इस बात का प्रमाण है कि वह उसकी मृत्यु चाहता था।
अदालत ने कहा,
"गर्भवती पत्नी को आग लगाने और फिर बाहर से दरवाजा बंद कर देने से आरोपी की हत्या की मंशा स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है।"
खंडपीठ ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग के हवाले करना स्वभावतः ऐसा कृत्य है जिससे मृत्यु होने की पूरी संभावना रहती है। इसलिए यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि मृत्यु का कारण केवल बाद में हुआ संक्रमण था।
दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए अदालत ने सजा में कुछ नरमी दिखाई। अदालत ने माना कि घटना के समय आरोपी की उम्र केवल 21 वर्ष थी, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, वह अत्यंत साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है और लगभग 15 वर्षों की जेल अवधि के दौरान उसका आचरण अच्छा रहा है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने आजीवन कारावास को 20 वर्ष के निश्चित कठोर कारावास में बदल दिया। अदालत ने कहा कि दंड व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि सुधार और समाज में पुनर्स्थापन का अवसर प्रदान करना भी है।

