माता-पिता की जिम्मेदारी के नाम पर पत्नी की उपेक्षा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बढ़ा भरण-पोषण बरकरार रखा
Amir Ahmad
2 April 2026 11:52 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की अपने माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति जिम्मेदारियां उसे अपनी पत्नी के भरण-पोषण के प्राथमिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकतीं।
जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने एक रेलवे कर्मचारी द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामले में फैमिली कोर्ट इटावा ने पत्नी के लिए मासिक भरण-पोषण राशि 3500 रुपये से बढ़ाकर 8000 रुपये और नाबालिग पुत्र के लिए 1500 रुपये से बढ़ाकर 4000 रुपये की थी।
पति ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वह रेलवे में ग्रुप-डी कर्मचारी है और लगभग 55,000 रुपये प्रतिमाह कमाता है। उसे अपने दैनिक खर्चों के साथ-साथ वृद्ध माता-पिता और अविवाहित भाई-बहनों का भी पालन-पोषण करना पड़ता है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति पर दबाव है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि 55,000 रुपये मासिक आय इतनी कम नहीं है कि वह पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हो।
अदालत ने कहा,
“केवल पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर पति अपने वैधानिक कर्तव्य से बच नहीं सकता। पत्नी का भरण-पोषण उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।”
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि भरण-पोषण संबंधी प्रावधान सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से बनाए गए ताकि पत्नी सम्मानजनक जीवन जी सके और पति की आर्थिक स्थिति के अनुरूप उसका पालन-पोषण हो सके।
अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों आय, सामाजिक स्थिति और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लिया। इसलिए उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या मनमानी नहीं है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि बरकरार रखी।

