मथुरा भगदड़ मामलों पर हाईकोर्ट सख्त, भीड़ प्रबंधन नीति और अवैध निर्माण पर प्रशासन को लगाई फटकार

Amir Ahmad

5 May 2026 5:28 PM IST

  • मथुरा भगदड़ मामलों पर हाईकोर्ट सख्त, भीड़ प्रबंधन नीति और अवैध निर्माण पर प्रशासन को लगाई फटकार

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा में हालिया भगदड़ जैसी घटनाओं और अवैध निर्माणों को लेकर प्रशासनिक तंत्र पर कड़ी नाराजगी जताते हुए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण तथा जिला प्रशासन को फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर प्रशासन की उदासीनता चिंताजनक है।

    जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण द्वारा दाखिल हलफनामे पर असंतोष जताते हुए पूछा कि उसके अधिकार क्षेत्र में अवैध निर्माण रोकने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोई नीति क्यों नहीं है।

    अदालत के पूछने पर प्राधिकरण के वकील ने स्वीकार किया कि ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए कोई नीति मौजूद नहीं है, जिनके कार्यकाल में अवैध निर्माण पनपे। इस पर हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या अदालत को अब संबंधित लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित करने चाहिए।

    पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम की धारा 27 के तहत ध्वस्तीकरण नोटिस तो नियमित रूप से जारी किए जाते हैं लेकिन अवैध निर्माण खड़े होने से पहले उन्हें रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते।

    मथुरा में हाल की भगदड़ जैसी घटनाओं पर प्रशासन के रवैये को लेकर अदालत ने मौखिक रूप से तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,

    “लिखकर दे दीजिए कि क्या आप लोगों को लोगों की मौत देखना अच्छा लगता है?”

    जिला मजिस्ट्रेट की ओर से दाखिल जवाब पर भी अदालत ने नाराजगी जताई। अदालत ने पहले जिला प्रशासन से पूछा था कि क्या शहर में भीड़ और आपदा प्रबंधन के लिए कोई समग्र योजना मौजूद है।

    प्रशासनिक अधिकारियों की क्षमता और प्रशिक्षण पर सवाल उठाते हुए पीठ ने पूछा,

    “इन्होंने भीड़ के व्यवहार का अध्ययन किस विश्वविद्यालय से किया है?”

    अदालत ने दाखिल हलफनामों की भाषा और गुणवत्ता पर भी गंभीर आपत्ति जताई।

    पीठ ने कहा,

    “यदि आप अदालत का आदेश ही नहीं समझ पाए तो हलफनामे में क्या परिलक्षित होगा?”

    हाईकोर्ट ने स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि प्रशासन हर बार नीति बताने के बजाय केवल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पेश कर देता है, जबकि वास्तविक नीति-निर्माण नहीं किया जा रहा।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।”

    मामले की अगली सुनवाई अब 19 मई को होगी।

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