अक्ल दांत और शरीर पर बाल से नाबालिग साबित नहीं होती लड़की, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण मामले में दोषी को किया बरी
Amir Ahmad
11 Sept 2026 4:52 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2011 के अपहरण मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि केवल अक्ल दांत का न निकलना या बगल और जननांगों पर बाल होने के आधार पर किसी लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने कहा कि तीसरी दात यानी अक्ल दांत का न निकलना इस निष्कर्ष का आधार नहीं हो सकता कि संबंधित व्यक्ति ने 18 वर्ष की उम्र पूरी नहीं की है। इसी तरह बगल और जननांगों पर बाल होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वे पूरी तरह विकसित नहीं हुए।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह भी याद दिलाया कि उसे चिकित्सकीय विशेषज्ञ की राय के स्थान पर अपनी व्यक्तिगत समझ को विशेषज्ञ राय के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट ने उसकी उम्र करीब 18 वर्ष बताई थी तब ट्रायल कोर्ट को खुद विशेषज्ञ बनकर डॉक्टरों की राय के ऊपर अपनी उम्र संबंधी राय नहीं थोपनी चाहिए थी।
मामला भैया लाल रैदास की आपराधिक अपील से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें IPC की धारा 366 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। हालांकि, उन्हें धारा 363 और 376 आईपीसी के आरोपों से बरी कर दिया गया।
मामले में 2011 में शिकायतकर्ता ने एफआईआर दर्ज कराई। आरोप था कि अपीलकर्ता, जो विवाहित है, उसकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। मई 2011 में पीड़िता की मेडिकल जांच हुई। एक्स-रे रिपोर्ट में उसकी उम्र करीब 18 वर्ष बताई गई। जांच करने वाले डॉक्टर ने उसकी उम्र 20 वर्ष के आसपास होने की संभावना जताई, जबकि रेडियोलॉजिस्ट ने उम्र करीब 18 वर्ष बताई और इसमें छह महीने तक कम या ज्यादा होने की संभावना बताई।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने अपने स्तर पर पीड़िता की उम्र 14 से 17 वर्ष के बीच मानी। अदालत ने उसके 14×14 दांत होने और मेडिकल रिपोर्ट में बगल तथा जननांगों पर बाल होने का उल्लेख करते हुए अपनी उम्र का आकलन किया था। ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना था कि तीसरी दाढ़ करीब 17 वर्ष की उम्र में निकलती है और बगल तथा जननांगों के बाल सामान्य तौर पर 17 वर्ष तक विकसित हो जाते हैं।
ट्रायल कोर्ट ने कथित कक्षा आठ की अंकतालिका में दर्ज जन्मतिथि 25 सितंबर 1993 को भी आधार बनाया। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि यह अंकतालिका ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा ही नहीं थी। न तो उस पर कोई दस्तावेज संख्या या प्रदर्श अंक था और न ही वह रिकॉर्ड की सूची में दर्ज थी। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट उस दस्तावेज में दर्ज जन्मतिथि को आधार नहीं बना सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि पीड़िता द्वारा मुख्य परीक्षा के दौरान कोई अतिरिक्त दस्तावेज पेश कर देने मात्र से उसे रिकॉर्ड पर नहीं लिया जा सकता, जब तक इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन न किया जाए। इसके अलावा कथित अंकतालिका को जारी करने वाले स्कूल के प्रधानाचार्य, प्रधानाध्यापक या किसी अन्य अधिकृत अधिकारी ने भी उसे साबित नहीं किया।
पीड़िता की शारीरिक बनावट के आधार पर उम्र तय करने के ट्रायल कोर्ट के तरीके पर भी हाईकोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट दोनों ने पीड़िता की उम्र करीब 18 वर्ष बताई, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने दांत और बाल देखकर खुद विशेषज्ञ की भूमिका अपना ली। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चिकित्सकीय रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया कि बगल और जननांगों के बाल पूरी तरह विकसित नहीं थे। इसलिए केवल उनकी मौजूदगी से नाबालिग होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
तीसरी दांत के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि उसका निकलना अनिवार्य नहीं है और अक्ल दाढ़ के न निकलने को इस बात का आधार नहीं बनाया जा सकता कि व्यक्ति ने 18 वर्ष की उम्र पूरी नहीं की है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रेडियोलॉजिकल उम्र निर्धारण में दोनों तरफ दो वर्ष तक की त्रुटि की संभावना रहती है। ऐसे में जब मेडिकल राय में पीड़िता की उम्र करीब 18 वर्ष बताई गई थी, तो निर्धारित अंतर को देखते हुए घटना के समय उसकी उम्र 20 वर्ष तक भी हो सकती थी। इस आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के अलग-अलग चरणों में दर्ज बयानों पर भी गौर किया। जांच अधिकारी के सामने धारा 161 और मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत दर्ज बयानों में उसने कहा कि वह अपनी मर्जी से अपीलकर्ता के साथ गई थी और उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया था। ट्रायल के दौरान गवाही देते समय भी उसने इन बयानों से इनकार नहीं किया।
बाद में पीड़िता ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने उसे कोई पदार्थ सुंघाया था जिससे वह बेहोश हो गई। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार करना कठिन माना। अदालत ने कहा कि यह मानना मुश्किल है कि अपीलकर्ता अकेले एक बेहोश वयस्क महिला को उन्नाव से लुधियाना ले जा सकता था। कोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि वह करीब सात महीने तक उसके साथ रही और इस दौरान उसके साथ बल प्रयोग किए जाने का कोई आरोप नहीं लगाया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किए बिना ट्रायल कोर्ट ने IPC की धारा 366 के तहत दोषसिद्धि की, जिससे उसके निष्कर्ष टिक नहीं सकते। इसके बाद हाईकोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए 8 फरवरी 2013 के ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया और भैया लाल रैदास को IPC की धारा 366 के मामले में बरी किया।


