सिर्फ दीवानी विवाद लंबित होने से आपराधिक मुकदमा खत्म नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
30 May 2026 2:27 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले के आरोप प्रथमदृष्टया आपराधिक अपराध का खुलासा करते हैं तो केवल इस आधार पर आरोपियों को राहत नहीं दी जा सकती कि पक्षकारों के बीच दीवानी विवाद भी लंबित है। अदालत ने कहा कि दीवानी और आपराधिक कार्यवाही साथ-साथ चल सकती हैं।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें कुछ आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनकी आरोपमुक्ति याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन बनाम एनईपीसी इंडिया लिमिटेड मामले का हवाला देते हुए कहा कि एक ही घटना से दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार के विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। केवल यह तथ्य कि किसी मामले में दीवानी उपचार उपलब्ध है या उसका उपयोग किया जा चुका है, आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता। असली कसौटी यह है कि शिकायत में किसी आपराधिक अपराध के तत्व मौजूद हैं या नहीं।
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने जबरन उसके मकान पर कब्जा कर लिया। इस संबंध में दीवानी मुकदमा भी दायर किया गया, जिसमें यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया। शिकायतकर्ता का यह भी आरोप था कि उसकी संपत्ति से कुछ सामान निकाल लिया गया और पुलिस पहुंचने से पहले आरोपी सामान लेकर फरार हो गए।
पुलिस द्वारा FIR दर्ज नहीं किए जाने पर शिकायतकर्ता ने अदालत का रुख किया, जिसके बाद FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया। जांच पूरी होने के बाद नौ लोगों के खिलाफ घर में घुसकर चोरी करने सहित विभिन्न धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया गया।
आरोपियों ने आरोपमुक्ति की मांग की, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज की कि जांच में एकत्र सामग्री प्रथमदृष्टया अपराध की ओर संकेत करती है।
हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा करते हुए कहा कि आरोपमुक्ति के चरण पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से अपराध किए जाने का संदेह उत्पन्न होता है या नहीं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पांचवें, छठे, आठवें और नौवें आरोपी के नाम शिकायतकर्ता द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए प्रारंभिक बयान में नहीं थे, लेकिन बाद में उन्हें आरोपपत्र में शामिल कर लिया गया। अदालत ने यह भी नोट किया कि ये सभी परिवार की महिलाएं थीं और उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य या बरामदगी नहीं थी।
हाईकोर्ट ने माना कि इन आरोपियों के नाम बाद में जोड़े गए प्रतीत होते हैं, इसलिए उन्हें आरोपमुक्त किए जाने का अधिकार है। इसके चलते अदालत ने पांचवें, छठे, आठवें और नौवें आरोपी को आरोपमुक्त कर दिया।
वहीं, पहले से चौथे आरोपी और सातवें आरोपी के खिलाफ शिकायतकर्ता की संपत्ति पर कब्जा करने और सामान चोरी करने के विशिष्ट आरोप पाए गए। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ प्रथमदृष्टया आपराधिक मामला बनता है।
हाईकोर्ट ने कहा,
"मौजूदा मामले में आरोप स्पष्ट रूप से आपराधिक कानून के तहत दंडनीय अपराधों का संकेत देते हैं। केवल इसलिए कि पक्षकारों के बीच दीवानी विवाद भी मौजूद है, यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चल सकता।"
इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने पहले से चौथे और सातवें आरोपी की याचिका खारिज की, जबकि पांचवें, छठे, आठवें और नौवें आरोपी को आरोपमुक्त करने का आदेश दिया।

