जले शव का 'बॉक्सर जैसा' मुड़ना अकेले यह साबित नहीं करता कि मौत से पहले जलाया गया: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

29 Aug 2026 2:06 PM IST

  • जले शव का बॉक्सर जैसा मुड़ना अकेले यह साबित नहीं करता कि मौत से पहले जलाया गया: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी जले हुए शव का हाथ-पैर मुड़कर बॉक्सर जैसी स्थिति में आ जाना अकेले यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति को जिंदा रहते जलाया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तेज गर्मी के कारण शव में इस तरह की स्थिति बन सकती है, चाहे आग लगने के समय व्यक्ति जिंदा हो या उसकी पहले ही मौत हो चुकी हो।

    जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने यह टिप्पणी एक आपराधिक अपील खारिज करते हुए की।

    अपीलकर्ता को वर्ष 1990 में अपनी पत्नी की मौत के मामले में दोषी ठहराया गया। पत्नी की वर्ष 1986 में ससुराल के घर के भीतर गंभीर रूप से जलने से मौत हुई।

    हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध चिकित्सकीय साक्ष्यों को एक साथ देखने के बाद माना कि वे महिला को जिंदा रहते जलाए जाने और हत्या की ओर इशारा करते हैं।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि घर के भीतर महिला इस तरह कैसे जली। यह तथ्य भी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी में एक अतिरिक्त महत्वपूर्ण कड़ी बना।

    'बॉक्सर जैसी स्थिति' को लेकर कोर्ट ने मोदी की मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस एंड टॉक्सिकोलॉजी का हवाला दिया। कोर्ट ने बताया कि अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने पर शरीर की मांसपेशियों में सिकुड़न के कारण हाथ-पैर मुड़ सकते हैं। कोहनी और घुटने मुड़े हुए तथा मुट्ठियां बंद होने के कारण शव की स्थिति मुक्केबाज जैसी दिखाई देती है।

    हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इस स्थिति के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जलने की चोटें मौत से पहले लगी थीं।

    कोर्ट ने कहा,

    "बॉक्सर जैसी स्थिति अपने आप में गर्मी के कारण बना बदलाव है। यह तब भी हो सकता है जब आग लगने के समय व्यक्ति जिंदा न हो।"

    पीठ ने कहा कि इस मामले में शव की ऐसी स्थिति को अन्य चिकित्सकीय साक्ष्यों के साथ देखा जाना जरूरी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर गहरे जलने के ऐसे निशान दर्ज थे, जो मौत से पहले लगी चोटों की ओर संकेत कर रहे थे। चोटों के किनारों पर लालिमा भी पाई गई। डॉक्टर ने राय दी थी कि मौत जलने से हुए सदमे और दम घुटने के कारण हुई, जो मौत से पहले जलने के कारण हुआ था।

    कोर्ट ने समझाया कि जलने वाली जगह के किनारे दिखाई देने वाली लालिमा शरीर की जीवित प्रतिक्रिया का संकेत होती है। इसका मतलब है कि चोट लगने के समय शरीर में रक्त का संचार हो रहा था और रक्त वाहिकाओं ने जलने की चोट पर प्रतिक्रिया दी थी। इसके विपरीत, मौत के बाद शव को जलाने पर ऐसी जीवित प्रतिक्रिया नहीं होती।

    पीठ ने कहा कि इस मामले में सांस की नली में कार्बन कण भी नहीं मिले थे। इसके अलावा ऐसा कोई अन्य मेडिकल तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह संकेत मिले कि पहले ही मर चुके व्यक्ति के शव में बाद में आग लगाई गई।

    मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि महिला का आधा जला हुआ शव घर के भीतर उस कमरे से बरामद हुआ, जिस घर में आरोपी रहता था।

    अभियोजन पक्ष ने महिला की ओर से अपने माता-पिता को लिखे गए एक पत्र पर भी भरोसा किया। मौत से कुछ समय पहले लिखे इस पत्र में महिला ने अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ना की शिकायत की थी और अपनी जान को खतरा होने की आशंका भी जताई।

    कोर्ट ने मामले में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का भी इस्तेमाल किया। इस प्रावधान के मुताबिक, किसी तथ्य की विशेष जानकारी यदि किसी व्यक्ति के पास है तो उस तथ्य को साबित करने की जिम्मेदारी उसी पर होती है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि धारा 106 के कारण अपराध साबित करने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष से हटकर आरोपी पर नहीं आ जाती।

    पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष को पहले अपराध से जुड़े जरूरी और आपत्तिजनक तथ्यों को साबित करना होता है।

    इसके बाद उन परिस्थितियों की व्याख्या करने की जिम्मेदारी आरोपी पर आती है, खासकर तब जब घटना उसके घर के भीतर हुई हो और उस समय वहां मौजूद लोगों को ही वास्तविक स्थिति की जानकारी हो सकती है।

    कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी केवल यह कहकर चुप नहीं रह सकता कि अपराध साबित करने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है। यदि आरोपी कोई स्पष्टीकरण नहीं देता या झूठा स्पष्टीकरण देता है तो अन्य परिस्थितियां पहले से साबित होने की स्थिति में उसकी चुप्पी या झूठ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी को और मजबूत कर सकता है।

    पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले शरद बिर्धीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य का भी हवाला दिया।

    कोर्ट ने कहा कि जब अभियोजन पक्ष अन्य परिस्थितियों को ठोस तरीके से साबित कर चुका हो, तब आरोपी की ओर से दिया गया झूठा स्पष्टीकरण परिस्थितियों की कड़ी में एक अतिरिक्त कड़ी बन सकता है। हालांकि, केवल झूठा बचाव अभियोजन पक्ष की किसी जरूरी कड़ी की कमी को पूरा नहीं कर सकता।

    आरोपी के वकील ने एक बचाव पक्ष के गवाह के बयान का हवाला देते हुए दलील दी थी कि महिला की मौत दुर्घटनावश हुई और जिस कमरे में घटना हुई, वह अंदर से बंद था।

    हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष यह नहीं बता सका कि महिला इस हालत में कमरे के अंदर कैसे पहुंची और दुर्घटना की कोई सूचना महिला के पिता को क्यों नहीं दी गई।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आरोपी ने महिला की ओर से अपने माता-पिता को लिखे गए उन पत्रों से इनकार नहीं किया था, जिनमें दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने की शिकायत की गई। इनमें से एक पत्र मौत से ठीक एक दिन पहले लिखा गया।

    पीठ ने कहा कि अगर आग वास्तव में दुर्घटना के कारण लगी होती और परिवार को इसकी जानकारी हुई होती तो बचाव पक्ष की कहानी यह नहीं समझाती कि महिला का शव उसके पिता के सामने खोजे जाने के लिए क्यों छोड़ दिया गया। घटना की सूचना पिता या पुलिस को दिए जाने की अपेक्षा थी।

    इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी अपनी ओर से आवश्यक स्पष्टीकरण देने में विफल रहा। उसकी ओर से पेश किया गया बचाव अभियोजन पक्ष की कहानी को कमजोर करने के बजाय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी को और मजबूत करता है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील खारिज करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी। आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 498-ए के तहत दोषी ठहराया गया।

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