अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करने की समय-सीमा तय नहीं, लेकिन बेवजह की देरी घातक हो सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

30 July 2026 3:35 PM IST

  • अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करने की समय-सीमा तय नहीं, लेकिन बेवजह की देरी घातक हो सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने के लिए कानून में कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति बिना उचित कारण के लंबे समय बाद अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो केवल देरी के आधार पर भी उसकी याचिका खारिज की जा सकती है।

    जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने करीब तीन वर्ष की देरी का कोई कारण नहीं बताया।

    खंडपीठ ने कहा,

    "अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने के लिए कानून में कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है। लेकिन जब अदालत की असाधारण रिट अधिकारिता का उपयोग किया जाता है, तब यह देखना आवश्यक होता है कि क्या याचिका उचित समय के भीतर दायर की गई।"

    अदालत ने कहा कि यदि यह पाया जाता है कि याचिकाकर्ता ने अनावश्यक देरी की है और उसके पास इसका कोई संतोषजनक कारण नहीं है, तो केवल इसी आधार पर याचिका खारिज की जा सकती है।

    खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यद्यपि मौलिक अधिकारों का परित्याग नहीं किया जा सकता, फिर भी अनुच्छेद 226 के तहत अपने विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग करते समय हाईकोर्ट को यह देखना होता है कि याचिकाकर्ता ने अदालत आने में अनावश्यक देरी तो नहीं की।

    हाईकोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के त्रिदीप कुमार डिंगल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2009) तथा कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम के. थंगप्पन (2006) मामलों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति विवेकाधीन है।

    अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि यदि याचिका दायर करने में हुई देरी का कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया हो, तो कानून में समय-सीमा तय न होने के बावजूद राहत देने से इनकार किया जा सकता है।

    मौजूदा मामले में पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता करीब तीन वर्ष बाद हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन उसने देरी का कोई कारण नहीं बताया।

    अदालत ने कहा,

    "हमारे विचार में इस अदालत का दरवाजा खटखटाने में लगभग तीन वर्ष की अत्यधिक देरी हुई। इस मामले में देरी और निष्क्रियता का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक अदालतों का दायित्व नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति बिना किसी पर्याप्त कारण के अपनी सुविधा के अनुसार काफी देर बाद अदालत आता है, तो अदालत को यह परखना होगा कि ऐसी विलंबित चुनौती पर सुनवाई की जानी चाहिए या नहीं।

    इन टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देरी और निष्क्रियता के आधार पर रिट याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज किया।

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