प्रतीक्षा सूची में नाम होने से नियुक्ति का अटल अधिकार नहीं बनता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

2 Jan 2026 5:33 PM IST

  • प्रतीक्षा सूची में नाम होने से नियुक्ति का अटल अधिकार नहीं बनता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में शामिल अभ्यर्थी को नियुक्ति का कोई पूर्ण या अटल अधिकार प्राप्त नहीं होता और न ही किसी चयन प्रक्रिया की प्रतीक्षा सूची को अनिश्चित काल तक जीवित रखा जा सकता है।

    जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने यह टिप्पणी सहायक अध्यापक (एलटी ग्रेड) भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि प्रतीक्षा सूची केवल सीमित अवधि और सीमित उद्देश्य के लिए होती है और इससे नियुक्ति का स्वतः अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

    मामले के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड, प्रयागराज द्वारा जारी विज्ञापन के तहत राज्य के निजी प्रबंधित, मान्यता प्राप्त एवं सहायता प्राप्त उच्च माध्यमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक (एलटी ग्रेड) पदों के लिए चयन प्रक्रिया में भाग लिया था। हालांकि प्रारंभ में उनके नाम न तो मेरिट सूची में आए और न ही प्रतीक्षा सूची में।

    इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां एकल पीठ ने बोर्ड को निर्देश दिया कि राज्य में उपलब्ध सभी रिक्तियों को भरा जाए। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने विशेष अपील दाखिल की, जिसमें यह निर्देश दिया गया कि चयनित अभ्यर्थियों, जिन्होंने कहीं जॉइन नहीं किया तथा प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को विकल्प देकर रिक्त पदों पर नियुक्ति की जाए और उसी के अनुसार नई पैनल सूची तैयार की जाए।

    इसके अनुपालन में चयन बोर्ड द्वारा काउंसलिंग प्रक्रिया पूरी की गई। बाद में एक आदेश पारित कर यह कहा गया कि पूर्व की प्रतीक्षा सूची में किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता नहीं है। इसी आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

    हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या चयन बोर्ड के लिए यह अनिवार्य है कि वह कुल रिक्तियों के 25 प्रतिशत तक की पूर्ण प्रतीक्षा सूची प्रकाशित करे या उसे इस सीमा के भीतर विवेकाधिकार प्राप्त है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार बोर्ड को अधिकतम 25 प्रतिशत तक प्रतीक्षा सूची प्रकाशित करने की अनुमति है, लेकिन यह बाध्यता नहीं है कि पूरी 25 प्रतिशत की सूची ही जारी की जाए। यह बोर्ड के विवेक पर निर्भर करता है कि वह 5 प्रतिशत, 10 प्रतिशत या किसी भी सीमा तक प्रतीक्षा सूची प्रकाशित करे, बशर्ते वह 25 प्रतिशत से अधिक न हो।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई समान मापदंड अपनाया नहीं गया, न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि किसी वैधानिक नियम का उल्लंघन हुआ है।

    यह पाते हुए कि भर्ती प्रक्रिया पहले ही समाप्त हो चुकी है और उत्तरदाताओं के निर्णय में कोई दुर्भावना या मनमानी नहीं है, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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