एक वकील और परिवार को अलग-अलग मामलों में 23 लाख से ज्यादा की सहायता, SC/ST Act के लाभों के दुरुपयोग की यूपी में जांच के आदेश
Amir Ahmad
7 Sept 2026 4:57 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 (SC/ST Act ) और उसके तहत बनाए गए नियमों के अंतर्गत मिलने वाली राहत और आर्थिक सहायता के दावों तथा वितरण की व्यापक जांच के निर्देश दिए। अदालत ने खास तौर पर एक ही व्यक्ति या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा बार-बार राहत का दावा किए जाने वाले मामलों की जांच और प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाने को कहा।
जस्टिस संतोष राय की बेंच ने यह निर्देश उस समय दिया जब अदालत के सामने राज्य सरकार ने बताया कि पेशे से वकील संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों को अलग-अलग आपराधिक मामलों में SC/ST Act और 1995 के नियमों के तहत कुल 23,36,250 रुपये की राहत और आर्थिक सहायता मिल चुकी है। इसके अलावा करीब 10 से 12 अन्य मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष राहत के दावों के साथ लंबित बताए गए।
हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल बार-बार आपराधिक मामले दर्ज होने और उनके बाद राहत का दावा किए जाने से अपने आप दुरुपयोग साबित नहीं होता। गलत इस्तेमाल का निष्कर्ष निकालने के लिए इससे अधिक सामग्री जरूरी है।
मामला झांसी के SC/ST Act के विशेष जज के उन आदेशों के खिलाफ दायर दो आपराधिक अपीलों से जुड़ा था, जिनमें SC/ST नियमों के तहत शेष आर्थिक सहायता जारी करने की अर्जियां खारिज कर दी गईं।
एक प्रमुख अपील में जांच अधिकारी ने नियम 12(4) की अनुसूची की मद संख्या 41 के तहत प्रत्येक पीड़ित को दो लाख रुपये की राहत देने का प्रस्ताव किया। नियमों के मुताबिक राहत की 25 प्रतिशत राशि FIR दर्ज होने के चरण में 50 प्रतिशत आरोपपत्र अदालत में भेजे जाने पर और शेष 25 प्रतिशत दोषसिद्धि के बाद दी जानी थी। इस तरह आरोपपत्र दाखिल होने के चरण में प्रत्येक पीड़ित को डेढ़ लाख रुपये मिलना था।
अपीलकर्ताओं का कहना था कि उन्हें केवल 75-75 हजार रुपये दिए गए और बाकी 75-75 हजार रुपये का भुगतान नहीं किया गया। विशेष जज ने यह कहते हुए उनकी अर्जियां खारिज कर दी थीं कि अदालत के लिए अपराध की प्रकृति तय करना या आर्थिक सहायता की राशि निर्धारित अथवा बढ़ाना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने विशेष जज के इस दृष्टिकोण को गलत आधार पर लिया गया फैसला बताया।
जस्टिस संतोष राय ने कहा कि नियम 12(7) विशेष अदालत या विशेष रूप से नामित विशेष अदालत को यह जांचने का अधिकार देता है कि राहत निर्धारित समय में दी गई या नहीं राहत या मुआवजा पर्याप्त है या नहीं और कहीं केवल उसका कुछ हिस्सा ही तो नहीं दिया गया।
अदालत ने कहा कि यदि विशेष अदालत संतुष्ट होती है कि राहत कम दी गई या समय पर नहीं मिली तो वह पूरी या आंशिक राहत अथवा अन्य सहायता के भुगतान का निर्देश दे सकती है। हाईकोर्ट ने इसे राहत की पर्याप्तता और समयबद्ध भुगतान पर सक्रिय न्यायिक निगरानी का प्रावधान बताया।
अदालत के अनुसार नियम 12(7) प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा राहत की कम राशि देने, भुगतान में देरी करने या वैधानिक राहत में मनमाने ढंग से कटौती करने के खिलाफ न्यायिक जांच की व्यवस्था करता है।
इसी सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की ओर से सामने रखे गए आंकड़ों का संज्ञान लिया। राज्य ने बताया कि संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार को अलग-अलग आपराधिक मामलों में 1995 के नियमों और संबंधित योजनाओं के तहत 23,36,250 रुपये मिल चुके हैं, जबकि करीब 10 से 12 अन्य मामलों में राहत के दावे जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि SC/ST Act के तहत राहत की व्यवस्था जातिगत अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों के लिए एक कल्याणकारी और संरक्षणात्मक उपाय है तथा इसकी व्यवस्था की शुचिता की पूरी तरह रक्षा की जानी चाहिए। हालांकि अदालत ने फिर स्पष्ट किया कि मामलों और राहत के दावों की संख्या मात्र से किसी गलत काम का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
लेकिन अदालत ने कहा कि सामने आई राहत की मात्रा और बारंबारता ऐसी है जिसे जांच के बिना नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसा न होने पर इस लाभकारी कानून का दुरुपयोग उसकी मूल भावना को ही नुकसान पहुंचा सकता है।
संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार से जुड़े मामलों के संबंध में हाईकोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ समन्वय कर विस्तृत, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करने का निर्देश दिया। जांच तीन महीने में पूरी करनी होगी। इसमें वकील और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की पृष्ठभूमि तथा उनमें प्राप्त या मांगी गई राहत की रकम की जांच की जाएगी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं SC/ST Act और 1995 के नियमों में दी गई कल्याणकारी व्यवस्था का दुरुपयोग तो नहीं हुआ।
अदालत ने साफ किया कि इस जांच के निर्देश को वकील या पीड़ितों के राहत पाने के अधिकार पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा। उनकी पात्रता का फैसला जिला स्तरीय समिति स्वतंत्र रूप से करेगी।
हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश में SC/ST Act, 1995 के नियमों और संबंधित सरकारी आदेशों तथा योजनाओं के तहत मिलने वाली राहत के दावों और भुगतान की व्यापक जांच के निर्देश भी दिए। राज्य सरकार को प्रत्येक जिले में प्रभावी नियामकीय और निगरानी व्यवस्था विकसित करने को कहा गया। खास तौर पर उन मामलों पर ध्यान देने का निर्देश दिया गया, जिनमें एक ही व्यक्ति या उसके परिवार के सदस्य बार-बार राहत का दावा करते हैं।
जांच में यह भी देखा जाएगा कि सरकारी धन जारी करने से पहले पर्याप्त सत्यापन और जांच की जा रही है या नहीं। जहां दुरुपयोग सामने आएगा, वहां सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। अदालत ने उत्तर प्रदेश में SC/ST Act के मामलों की सुनवाई करने वाले विशेष जजों को भी संभावित दुरुपयोग के प्रति सतर्क रहने को कहा, साथ ही यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि वास्तविक पीड़ितों को कानून के तहत मिलने वाली वैध सहायता से वंचित न किया जाए।
मूल आर्थिक सहायता के विवाद में हाईकोर्ट ने विशेष जज के आदेश रद्द कर दिए और दोनों अर्जियों पर नए सिरे से विचार करने के लिए मामला वापस भेज दिया। विशेष जज को प्रत्येक अपराध की प्रकृति और उसके आवश्यक तत्वों की जांच कर यह तय करना होगा कि नियम 12(4) की अनुसूची की कौन-सी मद लागू होती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपपत्र में दर्ज धाराओं के आधार पर यांत्रिक तरीके से यह फैसला नहीं किया जा सकता। आरोपों की वास्तविक प्रकृति और अपराध के आवश्यक तत्वों को ध्यान में रखना होगा।
इसके बाद जिला कल्याण समिति यह तय करेगी कि लागू होने वाली राहत एक लाख रुपये है या दो लाख रुपये और कारणयुक्त आदेश पारित करेगी। इसी निर्देश के साथ दोनों आपराधिक अपीलों का निपटारा कर दिया गया।


