जमीन अधिग्रहण पर बड़ा झटका: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ प्रशासनिक सुविधा से तत्कालता प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता
Amir Ahmad
13 April 2026 1:35 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मामलों में अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल प्रशासनिक सुविधा या आवश्यकता के आधार पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 17 (तत्कालता प्रावधान) लागू नहीं की जा सकती।
जस्टिस संगीता चंद्रा और जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का उपयोग तभी किया जा सकता है, जब वास्तविक, ठोस और प्रमाणित आपात स्थिति हो, जिसे अधिसूचना में स्पष्ट कारणों के साथ दर्ज किया जाए।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ प्रशासनिक आवश्यकता या सुविधा, चाहे वह कितनी भी जरूरी क्यों न लगे, कानून में निर्धारित 'तत्कालता' की कसौटी को पूरा नहीं करती। बिना ठोस कारणों के अधिसूचना में केवल औपचारिक रूप से 'तत्कालता' का उल्लेख करना कानूनन गलत है।”
मामले में याचिकाकर्ता ने अपनी जमीन के अधिग्रहण को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि बिना किसी वास्तविक आपात स्थिति के धारा 17 का सहारा लेकर उनकी आपत्तियों को सुनने का अधिकार (धारा 5-ए) समाप्त कर दिया गया और उन्हें बिना उचित मुआवजे के बेदखल कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने माना कि धारा 17 एक अपवाद स्वरूप शक्ति है, जिसका प्रयोग बहुत सावधानी और सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस प्रावधान के तहत भूमि मालिकों के महत्वपूर्ण अधिकार समाप्त हो जाते हैं, इसलिए इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
अदालत ने पाया कि अधिसूचना में केवल यह कहा गया कि यदि अधिग्रहण में देरी हुई तो आवासीय परियोजना प्रभावित होगी। कोर्ट ने इसे सामान्य प्रशासनिक तर्क बताते हुए कहा कि यह किसी भी परियोजना में लागू हो सकता है और इसे 'आपात स्थिति' नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि बिना 80 प्रतिशत मुआवजा दिए जमीन पर कब्जा लिया गया, जो कानून का उल्लंघन है। साथ ही विकास कार्य का कोई ठोस प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
अदालत ने कहा,
“संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल विधि द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। यदि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया तो ऐसी कार्रवाई असंवैधानिक होगी।”
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ओम प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि योजनाबद्ध विकास अपने आप में तत्कालता का आधार नहीं बन सकता।
अंततः हाईकोर्ट ने अधिग्रहण और उससे जुड़ी नीलामी कार्यवाही को अवैध और मनमाना बताते हुए रद्द किया। साथ ही निर्देश दिया कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत राशि जमा होने पर जमीन याचिकाकर्ता को वापस सौंपी जाए।

