करंट हादसे में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी, लापरवाही साबित करना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
6 April 2026 6:12 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि करंट लगने (इलेक्ट्रोक्यूशन) के मामलों में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी तय होती है और पीड़ित को मुआवजा पाने के लिए विभाग की लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस संदीप जैन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया,
“ऐसे मामलों में सख्त जिम्मेदारी का सिद्धांत लागू होता है और वादी को यह साबित करने की जरूरत नहीं कि बिजली लाइन के रखरखाव में विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही थी। उसे केवल यह साबित करना है कि उसे करंट से चोट लगी।”
मामला एक मजदूर से जुड़ा था, जो उस समय गंभीर रूप से घायल हो गया, जब एक जिंदा हाई वोल्टेज तार उसके ऊपर गिर गया। इस हादसे के कारण उसे गैंगरीन हो गया और उसका हाथ काटना पड़ा। उसने 65 प्रतिशत स्थायी विकलांगता का दावा करते हुए करीब 6.80 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
ट्रायल कोर्ट ने पाया कि तार गिरने से उसे गंभीर चोटें आईं और उसकी आय लगभग 200 रुपये प्रतिदिन थी। इस आधार पर अदालत ने 4 लाख रुपये मुआवजा और 5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।
इस फैसले को चुनौती देते हुए बिजली निगम ने दलील दी कि घटना को साबित करने का भार वादी पर है और हाई टेंशन तार टूटने पर बिजली स्वतः बंद हो जाती है, इसलिए करंट लगने का सवाल नहीं उठता। साथ ही यह भी कहा गया कि वादी ने मेडिकल खर्च से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए और मुआवजा अधिक है।
हाइकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया कि ऐसे मामलों में बिजली विभाग को स्वतः जिम्मेदार माना जाता है और पीड़ित को लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि वादी को जिंदा तार गिरने से गंभीर चोटें आईं, जिससे बिजली विभाग की जिम्मेदारी बनती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मुआवजे का निर्धारण मोटर दुर्घटना मामलों की तरह किया जाना चाहिए, जिसमें आय, चोट की गंभीरता, स्थायी विकलांगता, भविष्य की आय में कमी, इलाज का खर्च, दर्द और कष्ट आदि सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
अदालत ने माना कि पीड़ित की कार्यात्मक दिव्यांगता 100 प्रतिशत तक हो सकती थी। चूंकि उसने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी, इसलिए उसे अतिरिक्त लाभ नहीं दिया जा सकता।
अंततः हाईकोर्ट ने बिजली निगम की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा और जुर्माना भी लगाया।

