पेट दर्द की दवा से मां को शराबी नहीं कहा जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चे की अभिरक्षा मां को सौंपी
Amir Ahmad
13 May 2026 4:20 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पेट दर्द के इलाज से जुड़ी मेडिकल पर्चियों के आधार पर किसी महिला को शराब की आदी या मानसिक रूप से अस्वस्थ नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे आधार पर मां को उसके बच्चे की अभिरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संदीप जैन ने यह टिप्पणी करते हुए नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा मां को सौंप दी। अदालत ने कहा कि पांच वर्ष तक की आयु के बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक मां होती है।
मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें मां ने आरोप लगाया था कि बच्चे के पिता ने जबरन बच्चे को उससे अलग कर लिया।
सुनवाई के दौरान पिता की ओर से दावा किया गया कि मां शराब की आदी है और उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। इसके समर्थन में कुछ मेडिकल पर्चियां अदालत में पेश की गईं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि उन पर्चियों में केवल पेट दर्द का जिक्र था और डॉक्टर ने मसालेदार भोजन से बचने की सलाह दी थी। अदालत ने कहा कि किसी भी मेडिकल दस्तावेज में यह नहीं लिखा गया कि महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ है या शराब की आदी है।
अदालत ने कहा,
“इन मेडिकल पर्चियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता बच्चे की देखभाल करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से अयोग्य है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की अभिरक्षा मां को ही दी जाती है। अदालत ने कहा कि शुरुआती वर्षों में बच्चे की भावनात्मक, पोषण और विकास संबंधी जरूरतों को मां बेहतर ढंग से पूरा कर सकती है।
अदालत ने यह भी पाया कि मां अपने माता-पिता के साथ रह रही है और पति द्वारा कोई भरण-पोषण नहीं दिया जा रहा। वहीं पिता अपनी ओर से लगाए गए शराब और मानसिक अस्थिरता के आरोप साबित नहीं कर सका।
सुनवाई के दौरान मां ने दस्तावेजों के जरिए यह भी साबित किया कि पिता ने दूसरी शादी कर ली है और दूसरी महिला के साथ रह रहा है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पिता ने बाल कल्याण समिति के आदेश के बावजूद जबरन बच्चे को मां से अलग किया था।
अदालत ने यह भी नोट किया कि पिता, जो पुलिस कांस्टेबल है, को जौनपुर के सीनियर पुलिस अधीक्षक द्वारा निलंबित किया गया।
इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
“उसका व्यवहार दिखाता है कि उसे अदालत के आदेशों की कोई परवाह नहीं है। यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, क्योंकि वह एक अनुशासित बल का सदस्य है।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने मां की याचिका स्वीकार करते हुए बच्चे की अभिरक्षा उसे सौंप दी। साथ ही पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार भी दिया गया।

