FIR पर रोक के बावजूद छात्र नेता के खिलाफ दाखिल हुई चार्जशीट, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने थाना प्रभारी से मांगा जवाब
Amir Ahmad
12 Oct 2026 5:05 PM IST

उत्तर प्रदेश सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2025 में अनियमितताओं का आरोप लगाने वाली फेसबुक पोस्ट के मामले में छात्र नेता आशुतोष कुमार पांडेय के खिलाफ FIR पर हाईकोर्ट की रोक के बावजूद आरोपपत्र दाखिल किए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया।
अदालत ने लखनऊ के हुसैनगंज थाने के थाना प्रभारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि अदालत के आदेश के बाद भी मामले में जांच कैसे की गई और आरोपपत्र कैसे भेजा गया।
जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया, जब राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि मामले में 21 सितंबर 2026 को आरोपपत्र भेज दिया गया था।
अदालत ने अपने 30 सितंबर के आदेश में इस तथ्य पर ध्यान दिया कि FIR पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी थी।
आशुतोष कुमार पांडेय के खिलाफ हुसैनगंज थाने में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 221, 292 और 353(1)(बी) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66डी के तहत FIR दर्ज की गई। उन्होंने FIR रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। 11 अगस्त को अदालत ने मामले में FIR पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी और उसके आधार पर आशुतोष के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि में आशुतोष की 9 मई 2026 की फेसबुक पोस्ट है, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2025 में अनियमितताओं का आरोप लगाया। इस परीक्षा की चयन सूची 7 मई 2026 को जारी हुई।
FIR को चुनौती देते हुए आशुतोष के वकील ने दलील दी थी कि FIR में लगाए गए आरोपों से संबंधित अपराधों के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते। BNS की धारा 221 लोक सेवक को उसके सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन से रोकने से संबंधित है।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि FIR में ऐसा कोई आरोप नहीं है, जिससे साबित हो कि आशुतोष ने किसी लोक सेवक को उसके काम से रोका हो।
इसी तरह, धारा 292 के संबंध में दलील दी गई कि FIR में ऐसा कोई कृत्य या गैरकानूनी चूक नहीं बताई गई है, जिससे आम जनता को नुकसान, खतरा या परेशानी हुई हो।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने BNS की धारा 353 में दिए गए अपवाद पर विचार नहीं किया। इस प्रावधान में ऐसी स्थिति के लिए अपवाद है, जहां कथित गलत जानकारी देने, प्रकाशित करने या प्रसारित करने वाले व्यक्ति के पास उसे सच मानने के उचित आधार हों।
वकील ने तर्क दिया कि यदि आशुतोष को भर्ती परीक्षा में अनियमितताओं का संदेह था, तो अधिकारियों को उनके आरोपों की जांच करनी चाहिए थी, न कि उनके खिलाफ FIR दर्ज करनी चाहिए थी।
याचिका में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया पर उठाए गए सवालों की पड़ताल करने के बजाय शिकायतकर्ता को ही निशाना बनाया गया। IT Act की धारा 66डी के तहत धोखाधड़ी के आरोप के संबंध में भी बचाव पक्ष ने कहा कि प्राथमिकी से इस अपराध का मामला नहीं बनता।
इन दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया हस्तक्षेप का आधार पाया और FIR पर अगले आदेश तक रोक लगाई थी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि FIR के आधार पर आशुतोष के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
अब राज्य सरकार की ओर से जांच पूरी होने और 21 सितंबर को आरोपपत्र भेजे जाने की जानकारी मिलने पर अदालत ने हुसैनगंज थाना प्रभारी से व्यक्तिगत हलफनामे के जरिए स्पष्टीकरण मांगा।
राज्य सरकार के अनुरोध पर हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया।
मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर 2026 को होगी।

