शादी जैसी पवित्र संस्था को हल्के में नहीं लेना चाहिए: तलाक के बाद दोबारा शादी करने वाले दंपती को इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुरक्षा

  • शादी जैसी पवित्र संस्था को हल्के में नहीं लेना चाहिए: तलाक के बाद दोबारा शादी करने वाले दंपती को इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुरक्षा

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के बाद दोबारा शादी करने वाले दो बच्चों के माता-पिता दंपती के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन की सुरक्षा का आदेश दिया। अदालत ने साथ ही कहा कि “विवाह जैसी पवित्र संस्था को हल्के में नहीं लेना चाहिए।”

    जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने दंपती की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने अपने शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन की सुरक्षा और विवाह के पंजीकरण में सहायता की मांग की थी।

    याचिकाकर्ता पहले भी पति-पत्नी रह चुके थे और उनके दो बच्चे हैं। बाद में दोनों ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया। हालांकि, इसके बाद पूरे परिवार के हित को देखते हुए दोनों ने फिर से विवाह करने का फैसला किया।

    दंपती ने 2 अप्रैल 2026 को आर्य समाज मंदिर में दोबारा विवाह किया। लेकिन पति के पिता इस विवाह से सहमत नहीं थे। इसके बाद दंपती ने अपने शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप की आशंका जताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों पहले भी विवाहित रह चुके हैं और अब उन्होंने अपनी इच्छा से दोबारा विवाह किया। इसलिए कोई भी निजी व्यक्ति या सरकारी अधिकारी उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में बाधा नहीं डाल सकता।

    खंडपीठ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले के फैसले का हवाला दिया। अदालत ने यह भी कहा कि बालिग होने के बाद व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने की स्वतंत्रता है।

    हालांकि, दंपती के पहले तलाक और बाद में दोबारा विवाह करने की परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा कि “विवाह जैसी पवित्र संस्था को हल्के में नहीं लेना चाहिए।”

    अदालत ने कहा कि यदि किसी मामूली विवाद के कारण पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक ले लें और फिर दो बच्चों के माता-पिता होने के बावजूद दोबारा विवाह करें, तो यह वास्तव में दुखद स्थिति है।

    हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि लता सिंह के फैसले के तहत मिलने वाली सुरक्षा इन याचिकाकर्ताओं को भी उपलब्ध रहेगी।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए दंपती के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से सुरक्षा प्रदान की।

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