रोहिंग्या फंडिंग सिंडिकेट | इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार, जांच अधिकारी के 'लापरवाह' रवैये पर जताई कड़ी नाराज़गी

Amir Ahmad

12 Jan 2026 6:09 PM IST

  • रोहिंग्या फंडिंग सिंडिकेट | इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार, जांच अधिकारी के लापरवाह रवैये पर जताई कड़ी नाराज़गी

    इलाहाबाद हाइकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने शुक्रवार को ऐसे व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया, जिस पर बांग्लादेशी, रोहिंग्या और अन्य कथित राष्ट्रविरोधी तत्वों को अवैध एवं अनधिकृत सहायता देकर भारत में बसाने तथा अशांति और वैमनस्य फैलाने के लिए सिंडिकेट का “मुख्य सरगना” होने का आरोप है।

    जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता के बावजूद आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए आवश्यक कदम न उठाने पर जांच एजेंसी, विशेषकर जांच अधिकारी (आईओ), के लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर गंभीर असंतोष और पीड़ा भी व्यक्त की।

    संक्षेप में मामला

    अपीलकर्ता डॉ. अब्दुल गफ्फार ने स्पेशल, एनआईए/अपर सेशन जज, लखनऊ द्वारा नवंबर 2025 में अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए हाइकोर्ट का रुख किया था।

    यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की कठोर धाराओं धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र), धारा 370 (मानव तस्करी) के साथ-साथ विदेशियों अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के तहत दर्ज FIR से संबंधित है।

    आरोप है कि अपीलकर्ता ने कई बैंक खाते खुलवाए, अवैध माध्यमों से नकदी प्राप्त की और विदेशों से हवाला लेन-देन के जरिए घुसपैठियों व अनधिकृत व्यक्तियों को सहायता दी, जो कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त थे। यह भी आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता की सोसायटी के खाते में आई रकम का उपयोग भारत में कुछ स्थानों पर रोहिंग्या लोगों के लिए मकान, झुग्गियां आदि बनाने में किया गया।

    हाइकोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उन्हें केवल संदेह के आधार पर फंसाया गया। यह भी बताया गया कि जनवरी 2024 से फरवरी, 2025 के बीच अन्य आरोपियों के खिलाफ सात चार्जशीट दाखिल की जा चुकी हैं, लेकिन अपीलकर्ता के खिलाफ अब तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई।

    यह भी दलील दी गई कि उनके खिलाफ दो बार गैर-जमानती वारंट जारी हुए और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 82/83 के तहत उद्घोषणा भी जारी की गई, जिसे हाइकोर्ट ने पहले ही रद्द कर मामला पुनः स्पेशल जज, एनआईए/अपर सेशन जज-3, लखनऊ को कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने के लिए वापस भेज दिया।

    महत्वपूर्ण रूप से यह भी कहा गया कि जांच अधिकारी ने अपीलकर्ता के आवास पर तो दौरा किया, लेकिन दिल्ली स्थित उसके कार्यालय के लिए कोई तलाशी वारंट प्राप्त नहीं किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि जांच अधिकारी के पास अपीलकर्ता के खिलाफ कोई ठोस सामग्री नहीं थी और वह मामले की गंभीरता से जांच करना ही नहीं चाहता था।

    इसी आधार पर यह दलील दी गई कि चूंकि अपीलकर्ता को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया, इसलिए उसकी कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। उसे अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए।

    राज्य की ओर से अपर सरकारी वकील एस.एन. तिलहरी ने दलील दी कि भले ही उद्घोषणा का आदेश हाइकोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया हो, लेकिन चूंकि अपीलकर्ता पर गंभीर, संज्ञेय अपराधों के आरोप हैं, इसलिए जांच एजेंसी उसे बिना वारंट के भी गिरफ्तार कर सकती है।

    खंडपीठ ने सबसे पहले इस बात पर आपत्ति जताई कि जांच अधिकारी यह स्पष्ट करने में असफल रहा कि उसने अपीलकर्ता के आधिकारिक परिसरों की तलाशी के लिए कोई उपयुक्त आवेदन क्यों नहीं किया, जबकि वहां से महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलने की संभावना थी।

    खंडपीठ ने कहा,

    “हम जांच एजेंसी, विशेषकर जांच अधिकारी द्वारा उचित और प्रभावी कदम न उठाने के इस लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर गंभीर असंतोष और पीड़ा व्यक्त करते हैं। यह मामला केवल संज्ञेय अपराधों का नहीं है, बल्कि ऐसे अपराधों का है जिनसे देश की सुरक्षा, शांति और सामंजस्य को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।”

    इसलिए हाइकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन, अपर मुख्य सचिव (गृह), मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव/सचिव तथा पुलिस महानिदेशक को सूचना एवं आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजने का निर्देश दिया।

    मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए खंडपीठ ने अग्रिम जमानत देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता पर गंभीर आरोप हैं, जांच एजेंसी उसके खिलाफ विश्वसनीय सामग्री एकत्र कर रही है और उसकी हिरासत में पूछताछ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    खंडपीठ ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पिछले दो वर्षों में अपीलकर्ता की गिरफ्तारी न होना, अग्रिम जमानत देने का पर्याप्त आधार बनता है। कोर्ट ने कहा कि आरोप देश की सुरक्षा, अखंडता, शांति और सामंजस्य से जुड़े हैं, जांच लंबित है और अपीलकर्ता, गैर-जमानती वारंट व उद्घोषणा जारी होने के बावजूद, जांच एजेंसी के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ।

    खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पी. कृष्ण मोहन रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि हिरासत में की गई पूछताछ, अग्रिम जमानत के संरक्षण में की गई पूछताछ की तुलना में अधिक प्रभावी और तथ्य-उन्मुख होती है।

    इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील का निस्तारण कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह एक सप्ताह के भीतर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करे।

    खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता को हिरासत में लेना या न लेना, यह पूरी तरह जांच अधिकारी की “पूर्णतः व्यक्तिपरक संतुष्टि” पर निर्भर करेगा। यदि अपीलकर्ता को गिरफ्तार किया जाता है, तो वह नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है, जिसे ट्रायल कोर्ट शीघ्रता से कानून के अनुसार तय करेगा।

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