शहरों की टाउन प्लानिंग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, पुलिस थाने, फायर स्टेशन और अस्पतालों के लिए जगह तय करने पर मांगा जवाब
Amir Ahmad
3 Nov 2026 2:01 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शहरों और आवासीय कॉलोनियों की टाउन प्लानिंग में बुनियादी सुविधाओं के लिए जगह निर्धारित करने से जुड़े सुओ मोटो जनहित मामले का दायरा बढ़ा दिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संबंधित अधिकारियों से पूछा है कि शहरों, कस्बों और कॉलोनियों के लेआउट प्लान में पुलिस थानों, पुलिस चौकियों, ट्रैफिक बूथों, फायर स्टेशनों और मेडिकल क्लीनिकों या अस्पतालों के लिए जगह का प्रावधान किया जाता है या नहीं।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने भविष्य की टाउन प्लानिंग के लिए व्यापक रोडमैप तैयार करने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि नई कॉलोनियों और कस्बों में सुविधाओं की योजना बनाते समय आने वाले वर्षों में नागरिकों की जरूरतों का अनुमान लगाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA), उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद, लखनऊ नगर निगम और अन्य संबंधित अधिकारियों को मामले में उठाए गए मुद्दों पर हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया।
इन रि- लेआउट प्लान/टाउन प्लानिंग एंड प्रोविजन ऑफ नेसेसरी एमेनिटीज शीर्षक से शुरू की गई इस सुओ मोटो जनहित याचिका का उद्देश्य टाउन प्लानिंग में मौजूद कमियों पर ध्यान देना है। शुरुआत में मामला मुख्य रूप से शहरों, कस्बों और कॉलोनियों के लेआउट प्लान तैयार करते समय कचरा डालने या एकत्र करने के लिए जगह निर्धारित नहीं करने और ट्रांसफॉर्मर लगाने की व्यवस्था नहीं करने से जुड़ा था।
सुनवाई के दौरान नगर निगम के वकील ने लेआउट प्लान तैयार करने की प्रक्रिया में व्यापक समस्या की ओर कोर्ट का ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि विकास प्राधिकरण लेआउट प्लान बनाते समय कचरा डालने और उसके संग्रह के लिए जगह निर्धारित नहीं करते। नतीजतन, जब बाद में कॉलोनियां विकसित होती हैं तो कचरा प्रबंधन में परेशानी आती है।
वकील ने यह भी बताया कि ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए भी कोई जगह निर्धारित नहीं की जाती। इसके चलते बाद में ट्रांसफॉर्मर सड़कों के किनारे लगाए जाते हैं, जिससे आवागमन में बाधा और अन्य असुविधाएं पैदा होती हैं।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा था कि यह मुद्दा विचार किए जाने योग्य है, क्योंकि इसका संबंध टाउन प्लानिंग और जरूरी सुविधाओं के प्रावधान से है। ये सुविधाएं विकास प्राधिकरणों और उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद जैसी संस्थाओं द्वारा विकसित कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के स्वस्थ, स्वच्छ और सुरक्षित जीवन को प्रभावित करती हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सुओ मोटो जनहित याचिका में विचार का दायरा शहर, कस्बे या उनके भीतर विकसित होने वाली कॉलोनी का लेआउट प्लान तैयार करते समय उपलब्ध कराई जाने वाली जरूरी सुविधाओं और स्थानों तथा टाउन प्लानिंग से जुड़े अन्य मामलों तक होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि योजना तैयार करने वाले अधिकारियों को समय के साथ बदलती जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए और भविष्य की आवश्यकताओं का पहले से अनुमान लगाना चाहिए।
पिछले सप्ताह हुई सुनवाई में एलडीए और आवास एवं विकास परिषद की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2025 में लागू हुए नए भवन उपनियमों में कचरा डालने की जगह, ट्रांसफॉर्मर लगाने और ऐसी ही अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए प्रावधान किए गए। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस बात की निश्चित जानकारी नहीं है कि ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए जगह निर्धारित करने का कोई स्पष्ट प्रावधान है या नहीं। इसके लिए उन्हें नियमों की जांच करनी होगी।
इस पर कोर्ट ने LDA और आवास एवं विकास परिषद को हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही, ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए जगह उपलब्ध कराने के संबंध में सुझाव देने और इस विषय से जुड़े लागू नियमों को रिकॉर्ड पर रखने को कहा।
खंडपीठ ने यह भी पूछा कि क्या लेआउट प्लान तैयार करते समय बिजली निगम या बिजली विभाग जैसी अन्य संस्थाओं और एजेंसियों से परामर्श किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा परामर्श ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान करने में मददगार हो सकता है।
अधिकारियों को अपने हलफनामों में यह बताने को कहा गया कि लेआउट प्लान तैयार करते समय किन विभागों, निगमों और सार्वजनिक उपक्रमों से सलाह ली जाती है तथा किन एजेंसियों के साथ विचार-विमर्श किया जाता है।
कोर्ट ने यह भी जानकारी मांगी कि क्या लेआउट प्लान में समय की जरूरतों और पुराने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए पुलिस थानों, पुलिस चौकियों, पुलिस बूथों और ट्रैफिक बूथों की स्थापना के लिए जगह निर्धारित की जाती है। यदि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, तो अधिकारियों को इस संबंध में अपनी प्रस्तावित योजना बतानी होगी।
इसके अलावा, राज्य के अधिकारियों से यह भी स्पष्ट करने को कहा गया कि भवन उपनियमों और लेआउट प्लान में फायर स्टेशन तथा चिकित्सा क्लीनिकों या अस्पतालों के लिए जगह का प्रावधान है या नहीं।
लखनऊ नगर निगम को भी हलफनामा दाखिल कर यह सुझाव देने को कहा गया कि ऐसे लेआउट प्लान में कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
दीर्घकालिक योजना की जरूरत पर जोर देते हुए खंडपीठ ने कहा,
“नई कॉलोनियों, कस्बों आदि में उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं के संबंध में आने वाले समय में नागरिकों की जरूरतों का अनुमान लगाते हुए भविष्य की टाउन प्लानिंग के लिए व्यापक रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि क्या इन जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा नियमों या दिशानिर्देशों में किसी बदलाव की आवश्यकता है।
संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर हलफनामे दाखिल करने होंगे। मामले में अगली सुनवाई 7 दिसंबर को होगी। कोर्ट ने स्वत:संज्ञान कार्यवाही में सहायता के लिए वकील राकेश देवी प्रसाद कुमार को एमिक्स क्यूरी भी नियुक्त किया।

