लखनऊ कोर्ट हिंसा मामला: हाईकोर्ट ने दिए चार वकीलों की आईबी जांच के आदेश, कहा- बार के काली भेड़ों की पहचान का समय आ गया
Amir Ahmad
28 July 2026 4:42 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ जिला कोर्ट परिसर में 21 जुलाई को हुई हिंसा के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए चार आरोपित वकीलों की खुफिया ब्यूरो (IB) से गोपनीय जांच कराने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने इन वकीलों को पिछले 10 वर्षों की आयकर रिटर्न संपत्ति, कारोबार, परिवार और पिछले पांच वर्षों के संपत्ति लेन-देन का पूरा ब्योरा अदालत में पेश करने का निर्देश दिया।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान लेकर चल रही सुनवाई में कहा कि वकालत पेशे की गरिमा बनाए रखने के लिए बार के भीतर मौजूद "काली भेड़ों" की पहचान कर उन्हें जवाबदेह बनाना जरूरी है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्दोष और ईमानदार वकीलों को किसी भी तरह से परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा,
"अब समय आ गया कि बार की काली भेड़ों की पहचान कर उन्हें जल्द-से-जल्द जवाबदेह बनाया जाए। जो लोग अदालत के भीतर या बाहर का माहौल खराब करने पर आमादा हैं, उनके खिलाफ सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए।"
हाईकोर्ट ने लखनऊ स्थित IB के संयुक्त निदेशक को निर्देश दिया कि वह वकील सौरभ कुमार वर्मा, हर्षित पांडेय, यश पांडेय और अभय प्रताप वर्मा की गतिविधियों और पृष्ठभूमि की गोपनीय जांच कर सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।
अदालत ने इन चारों वकीलों को पिछले 10 वर्षों की आयकर रिटर्न, अपनी चल-अचल संपत्तियों, कारोबार, परिवार के जीवित सदस्यों तथा पिछले पांच वर्षों में स्वयं या परिवार की ओर से की गई संपत्ति की बिक्री, पट्टा या उपहार संबंधी सभी जानकारियां भी दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यदि आवश्यकता हुई तो उनकी संपत्तियों की जांच का दायरा आगे भी बढ़ाया जा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि इस मामले और पहले की सुनवाई में ऐसे आरोप सामने आए हैं कि कुछ वकीलों ने वकालत के अलावा अन्य अवैध गतिविधियों के जरिए कम समय में भारी संपत्ति अर्जित की। अदालत ने यह भी कहा कि कुछ वकीलों के खिलाफ ऐसे आरोप हैं कि वे संपत्ति के कारोबार और जमीन पर अवैध कब्जे जैसी गतिविधियों में शामिल हैं।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वकील सौरभ कुमार वर्मा के खिलाफ लखनऊ के विभिन्न थानों में आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि यश पांडेय के खिलाफ भी एक आपराधिक मामला लंबित है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी मामले में दोष तय नहीं कर रही है, लेकिन यह गंभीर प्रश्न है कि किसी वकील के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में आपराधिक मामले क्यों दर्ज हैं।
अदालत ने चारों वकीलों को उन सभी दीवानी मामलों का विवरण भी देने का निर्देश दिया, जिनमें वे पक्षकार रहे हैं या वकील के रूप में पेश हुए हैं। अदालत के अनुसार, यह निर्देश इसलिए आवश्यक है, क्योंकि आरोप हैं कि कुछ लोग अदालत की कार्यवाही का इस्तेमाल जमीन और संपत्ति पर अवैध कब्जा करने के लिए करते हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कई वकीलों ने अदालत को बताया कि जिला कोर्ट परिसर में कुछ ऐसे समूह सक्रिय हैं जो गुंडों की तरह व्यवहार करते हैं और वकील होने की पहचान का दुरुपयोग कर संपत्तियों पर कब्जा करते हैं।
अदालत ने कहा कि ऐसे लोग फर्जी दस्तावेज तैयार करते हैं, मुकदमे दायर कर कब्जे का रास्ता बनाते हैं, अदालतों पर दबाव डालते हैं और विरोधी पक्ष को वकील के जरिए मुकदमा लड़ने तक से रोकते हैं, जिससे न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है।
अदालत ने कहा कि अधिकांश वकील ईमानदारी से अपने पेशे का निर्वहन करते हैं, लेकिन कुछ "काली भेड़ें" पूरे माहौल को खराब कर रही हैं। पहले दिए गए चेतावनी वाले आदेशों का कोई असर नहीं हुआ। इसलिए कड़ी टिप्पणियों का समय अब समाप्त हो चुका है, अब कार्रवाई का समय है।
उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज, जिला जज की रिपोर्ट, पुलिस आयुक्त की रिपोर्ट और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने चारों नामित वकीलों के लखनऊ जिले की किसी भी अदालत में प्रवेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई। हालांकि उन्हें वर्तमान कार्यवाही या किसी आपराधिक मामले में कानून के अनुसार पेश होने की अनुमति दी गई।
यह मामला 21 जुलाई को लखनऊ जिला अदालत परिसर में दिल्ली के तीन वकीलों, जिनमें दो महिला वकील शामिल थीं, और उनके मुवक्किल मोहम्मद शाकिर के साथ कथित मारपीट की घटना से जुड़ा है। आरोप है कि जब दिल्ली के वकील एक दीवानी मुकदमे में वकालतनामा दाखिल करने पहुंचे, तब उन्हें रोक दिया गया और उनके मुवक्किल के साथ मारपीट की गई। बाद में हाईकोर्ट ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की।


