ऑनलाइन सर्च करने वालों को फोन कर OTP से सहमति लेने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी
Amir Ahmad
21 Sept 2026 2:56 PM IST

ऑनलाइन किसी सेवा या जानकारी की तलाश करने वाले लोगों से संपर्क कर उन्हें सेवाएं देने और फिर OTP या वेब लिंक के जरिए सहमति हासिल करने की प्रक्रिया पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां सार्वजनिक रूप से हो रही हैं और इनका असर आम लोगों पर पड़ता है। इसलिए ऐसे मामलों पर केवल संबंधित विवाद के तथ्यों के आधार पर नहीं बल्कि व्यापक दृष्टिकोण से भी विचार किए जाने की जरूरत है।
यह टिप्पणी जस्टिस प्रकाश पड़िया और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने विदेश में पढ़ाई करने की इच्छुक एक छात्रा से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला उस कर्ज से जुड़ा है, जिसे छात्रा ने विदेश में पढ़ाई के लिए लिया था। छात्रा का आरोप है कि पढ़ाई के लिए उपयुक्त संस्थान नहीं मिल पाने के बाद उसने कर्ज रद्द करने का अनुरोध किया लेकिन समय रहते कर्ज रद्द नहीं किया गया। इस वजह से उसके पिता के सिबिल अंक पर भी प्रतिकूल असर पड़ा।
याचिकाकर्ता वल्लभी यादव विदेश में पढ़ाई के लिए उपयुक्त संस्थान की तलाश कर रही थीं। इसी दौरान ऑनलाइन सर्च के बाद उनका संपर्क लीवरेज एजुकेशन के कर्मचारियों से हुआ। उन्हें बताया गया कि संस्था विदेश के उपयुक्त शिक्षण संस्थान से संपर्क कराने के साथ पढ़ाई की फीस और अन्य खर्चों के लिए धन की व्यवस्था कराने में भी सहायता करेगी।
इसके बाद यादव की बातचीत संस्था के परामर्शदाता से हुई। विदेश में पढ़ाई के लिए संस्थान तलाशने और धन की व्यवस्था करने की प्रक्रिया में वह टेकफिनो कैपिटल प्राइवेट लिमिटेड तथा अन्य संबंधित पक्षों के संपर्क में भी आईं।
याचिका के अनुसार लीवरेज एजुकेशन की ओर से दिए गए आश्वासन के आधार पर छात्रा ने वेब लिंक के जरिए कर्ज की प्रक्रिया पूरी की और ओटीपी के माध्यम से उसे स्वीकार किया। बाद में जब वह संबंधित शैक्षणिक सत्र के लिए उपयुक्त शिक्षण संस्थान हासिल नहीं कर सकीं तो उन्होंने कर्ज सुविधा रद्द करने का अनुरोध किया, क्योंकि अब उसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी।
आरोप है कि लीवरेज एजुकेशन के प्रतिनिधियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि परामर्श शुल्क और अन्य निर्धारित रकम काटने के बाद कर्ज सुविधा वापस ले ली जाएगी। हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार कर्ज समय पर रद्द नहीं किया गया।
कर्ज की किस्तें छात्रा के पिता के बैंक अकाउंट से काटी जानी थीं। वह वेतनभोगी कर्मचारी हैं। कर्ज रद्द नहीं होने के कारण उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक से संबंधित खाते से किस्त की रकम काटे जाने पर रोक लगाने का अनुरोध किया। इसके बाद कर्ज रद्द कर दिया गया लेकिन किस्त का भुगतान नहीं होने से कर्ज खाते पर कथित चूक दर्ज हो गई।
याचिका में कहा गया कि छात्रा के पिता का सिबिल अंक पहले 900 था, जो बाद में घटकर 681 रह गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सिबिल अंक कम होने के कारण अब छात्रा की आगे की पढ़ाई के लिए नया शैक्षणिक कर्ज हासिल करने में उसके पिता को कठिनाई हो रही है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ी इस व्यापक समस्या पर ध्यान दिया।
खंडपीठ ने कहा,
“सेवा प्रदाता अक्सर उन लोगों को फोन करते हैं या मैसेज भेजते हैं, जिन्होंने ऑनलाइन कुछ सामग्री सर्च होती है और फिर OTP या वेब लिंक शेयर करके ऑनलाइन सहमति लेते हैं।”
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि ऐसे मुद्दे पर मामले के मूल विवाद के साथ-साथ व्यापक स्तर पर भी विचार किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को मामले में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए। 16 सितंबर को लीवरेज एजुकेशन की ओर से वकील अदालत में पेश हुए लेकिन नोटिस की तामील के बावजूद अन्य प्रतिवादियों की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
इसके बाद हाईकोर्ट ने अनुपालन रजिस्ट्रार को संबंधित पक्षों को नोटिस की तामील कराने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया। इसमें गौतमबुद्ध नगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के माध्यम से तथा कर्नाटक और बॉम्बे हाईकोर्ट के महापंजीयकों के माध्यम से नोटिस भेजने के निर्देश भी शामिल हैं।
अदालत ने एमिक्स क्यूरी को भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में सामान्य तौर पर पेश होने वाले एडवोकेट को भी नोटिस देने की अनुमति दी। रिजर्व बैंक की ओर से पेश होने वाले वकील को मामले में निर्देश प्राप्त करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार समेत सभी प्रतिवादियों को अपना जवाब और प्रतिशपथपत्र दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।
मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को दोपहर दो बजे निर्धारित की गई।

