वसीयत के आधार पर नहीं मिल सकती अनुकंपा नियुक्ति, मृतक पर निर्भरता ही निर्णायक: इलाहाबाद हाइकोर्ट
Amir Ahmad
14 Jan 2026 3:06 PM IST

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मृत सरकारी कर्मचारी की वसीयत (विल) के आधार पर नहीं दिया जा सकता।
हाइकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश मृतक आश्रित नियम, 1974 के तहत अनुकंपा नियुक्ति का आधार केवल यह होता है कि आवेदक मृतक कर्मचारी पर वास्तव में निर्भर था या नहीं, न कि यह कि वसीयत किसके पक्ष में बनाई गई।
जस्टिस मनीष माथुर ने अपने फैसले में कहा कि नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत मृतक की वसीयत के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता तय की जाए।
उन्होंने कहा कि पंजीकृत वसीयत का अनुकंपा नियुक्ति से कोई संबंध नहीं है। इस प्रकार की नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना होता है और इसके लिए यह देखा जाना आवश्यक है कि आवेदक वास्तव में मृतक पर निर्भर था या नहीं। साथ ही यह भी जरूरी है कि नियुक्ति से विधवा और नाबालिग बच्चों सहित पूरे परिवार का हित सुरक्षित हो।
मामले में याचिकाकर्ता ने अपने भाई की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। उसका कहना था कि मृतक की पत्नी उससे अलग रह रही थी और वह स्वयं अपने भाई की देखभाल करता था।
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि मृतक ने उसके पक्ष में वसीयत बनाई थी। हालांकि विभाग ने उसका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि केवल वसीयत के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाइकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने पाया कि मृतक की पत्नी और याचिकाकर्ता, दोनों ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन आपसी विरोधाभासी दस्तावेजों के कारण दोनों के दावे खारिज कर दिए गए।
हाइकोर्ट ने 1974 के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि नियम 2(सी) में परिवार की परिभाषा दी गई, जिसमें पति या पत्नी के साथ अविवाहित भाई को भी शामिल किया गया। नियमों में यह भी बताया गया है कि यदि एक से अधिक पारिवारिक सदस्य अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करें, तो किस प्रकार निर्णय लिया जाएगा। लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया कि वसीयत को प्राथमिकता दी जाएगी।
जस्टिस माथुर ने कहा कि विभाग के प्रमुख को यह तय करना होता है कि आवेदक मृतक पर आश्रित था या नहीं और क्या वह मृतक के परिवार, विशेष रूप से विधवा और नाबालिग बच्चों की देखभाल करने में सक्षम है।
यह देखते हुए कि मृतक की एक बेटी भी है, हाइकोर्ट ने विवादित आदेश रद्द कर दिया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि दोनों आवेदनों पर नए सिरे से, कानून के अनुसार और शीघ्र निर्णय लिया जाए।

