मुकदमे में संशोधन की समयसीमा पर अहम फैसला: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कहा- मुकदमे के चरण के आधार पर होगा निर्णय
Amir Ahmad
18 March 2026 1:47 PM IST

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सिविल मामलों में याचिका (प्लीडिंग) में संशोधन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संशोधन आवेदन की समयसीमा का आकलन मुकदमे की शुरुआत की तारीख से नहीं, बल्कि मुकदमे किस चरण में है, इसके आधार पर किया जाना चाहिए।
जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के तहत अदालत को किसी भी चरण में संशोधन की अनुमति देने का अधिकार है। बशर्ते वह वास्तविक विवाद के समाधान के लिए आवश्यक हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक चरण (ट्रायल शुरू होने से पहले) में संशोधन को अधिक उदारता से स्वीकार किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा,
“संशोधन आवेदन में देरी का आकलन केवल मुकदमा दायर होने की तारीख से नहीं किया जाना चाहिए बल्कि यह देखना होगा कि सुनवाई किस स्तर तक पहुंच चुकी है।”
मामले के अनुसार वर्ष 2015 में याचिकाकर्ता ने एक संपत्ति को अपने नाम घोषित कराने के लिए मुकदमा दायर किया था, जो एक वसीयत के आधार पर था। बाद में वर्ष 2022 में उसने संशोधन आवेदन दायर करते हुए आरोप लगाया कि मुकदमे के दौरान प्रतिवादी ने जबरदस्ती संपत्ति पर कब्जा कर लिया।
ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए संशोधन आवेदन खारिज कर दिया कि इसमें देरी हुई है और मुद्दे तय होने के बाद इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई, जिसके बाद मामला हाइकोर्ट पहुंचा।
हाइकोर्ट ने पाया कि संशोधन आवेदन उस घटना के तीन साल के भीतर दायर किया गया, जब कथित तौर पर कब्जा किया गया।
अदालत ने कहा कि यह नया कारण मुकदमा दायर होने के बाद उत्पन्न हुआ और यदि इसके लिए अलग मुकदमा दायर किया जा सकता है तो उसी राहत को मौजूदा मुकदमे में संशोधन के जरिए देने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संशोधन की अनुमति देते समय उसके गुण-दोष का फैसला नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि कब्जे का सवाल साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल में तय होगा।
चूंकि मामले में केवल मुद्दे तय हुए थे और अभी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं हुए, इसलिए हाइकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश गलत माना और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करते हुए संशोधन आवेदन को मंजूरी दी।
अदालत ने कहा कि इस तरह के संशोधन से अनावश्यक रूप से अलग-अलग मुकदमे दायर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।

