लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार खत्म होने पर प्रतिवादी अपना साक्ष्य पेश नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
17 July 2026 5:31 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्रतिवादी का लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त हो गया है, तो उसे अपने पक्ष में साक्ष्य पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य केवल उन्हीं तथ्यों को सिद्ध करने के लिए दिया जा सकता है, जिनका उल्लेख पक्षकार ने अपनी दलीलों में किया हो। जब लिखित बयान ही नहीं है, तो उसके समर्थन में साक्ष्य देने का भी कोई आधार नहीं बनता।
जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,
"यदि कोई पक्षकार किसी महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख अपनी दलीलों में नहीं करता तो वह उस तथ्य पर साक्ष्य नहीं दे सकता। जब लिखित बयान ही दाखिल नहीं किया गया, तब कोई दलील मौजूद नहीं है और दलीलों के अभाव में साक्ष्य की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लिखित बयान दाखिल न करने वाले प्रतिवादी को मुकदमे से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता। वह वादी के गवाहों से जिरह कर सकता है और वादपत्र तथा वादी के साक्ष्यों के आधार पर अपनी दलीलें रख सकता है, लेकिन अपने पक्ष में स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकता।
मामला गाजियाबाद कोर्ट में वर्ष 2017 के विक्रय अनुबंध के विशेष निष्पादन से संबंधित वाद का था। प्रतिवादी ने अदालत में उपस्थित होने के बावजूद निर्धारित समय के भीतर लिखित बयान दाखिल नहीं किया। अतिरिक्त अवसर मिलने के बाद भी लिखित बयान प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके बाद अदालत ने उसका यह अधिकार समाप्त कर दिया।
इसके बाद प्रतिवादी ने वादी के गवाहों से जिरह की और फिर अपने साक्ष्य के लिए हलफनामा तथा गवाहों की सूची दाखिल की। वादी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जब लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त हो चुका है तो प्रतिवादी अपने पक्ष में साक्ष्य नहीं दे सकता।
ट्रायल कोर्ट ने यह आपत्ति स्वीकार करते हुए प्रतिवादी का साक्ष्य हलफनामा वापस किया और उसके साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार भी समाप्त किया। इस आदेश को प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के अनुसार दलीलों का उद्देश्य विवादित मुद्दों को स्पष्ट करना होता है, ताकि मुकदमे का दायरा अनावश्यक रूप से न बढ़े। यदि लिखित बयान नहीं है तो प्रतिवादी की ओर से कोई दलील ही मौजूद नहीं रहती, ऐसे में उसके समर्थन में साक्ष्य भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने इस संबंध में मोडुला इंडिया बनाम कमाक्ष्या सिंह देव और कौशिक नरसिंहभाई पटेल बनाम एस.जे.आर. प्राइम कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने प्रतिवादी की याचिका खारिज की।


