ऑनर किलिंग मामले में पिता और भाई की उम्रकैद बरकरार, घटना से पहले और बाद का आचरण बना अहम सबूत: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 Aug 2026 4:57 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो नाबालिग बहनों की कथित ऑनर किलिंग के मामले में पिता और भाई को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
कोर्ट ने कहा कि अपराध से पहले और बाद में आरोपियों का आचरण भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत महत्वपूर्ण परिस्थिति है और इस मामले में वही उनके अपराध की ओर स्पष्ट संकेत करता है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने राम प्रसाद और उसके बेटे चंद्रभान की आपराधिक अपील खारिज करते हुए वर्ष 2019 में अमरोहा की फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले को सही ठहराया। निचली अदालत ने दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अभियोजन के अनुसार 16 अक्टूबर 2016 को राम प्रसाद ने अपनी 13 वर्षीय बेटी दयावती और 11 वर्षीय बेटी धर्मवती को डांटने के बाद घर छोड़ दिया। बाद में परिवार की ओर से दावा किया गया कि दोनों बहनों ने पास के आम के बाग में दुपट्टे से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद परिवार के लोगों ने पुलिस को सूचना दिए बिना दोनों शवों को गंगा नदी के खादर क्षेत्र में ले जाकर दफना दिया।
गांव के पूर्व प्रधान की लिखित शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया। जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद शवों को बाहर निकालकर पोस्टमार्टम कराया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की कहानी पूरी तरह गलत साबित हुई। डॉक्टर ने दोनों बच्चियों के शरीर पर कई चोटों के निशान पाए और उनकी मौत का कारण गला दबाकर हत्या बताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पोस्टमार्टम में फांसी के कोई निशान नहीं मिले और उपलब्ध मेडिकल सबूत से यह संदेह से परे साबित हो गया कि दोनों बच्चियों की हत्या गला दबाकर की गई।
अपील में आरोपियों ने दलील दी कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है आखिरी बार साथ देखे जाने का कोई साक्ष्य नहीं है और अधिकांश गवाह अपने बयान से मुकर गए। उन्होंने यह भी कहा कि निचली अदालत ने पुलिस के समक्ष दिए गए बयानों पर गलत तरीके से भरोसा किया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि भले ही कई गवाह मुकर गए हों लेकिन उनके बयानों से भी यह स्पष्ट होता है कि बच्चियां पेड़ से लटकी हुई नहीं मिली थीं और आत्महत्या की कहानी पुलिस को गुमराह करने के लिए गढ़ी गई।
कोर्ट ने कहा कि यदि वास्तव में बच्चियों ने आत्महत्या की होती तो परिवार के लोग तुरंत पुलिस को सूचना देते और कानूनी प्रक्रिया अपनाते। इसके विपरीत आरोपियों ने शवों को जल्दबाजी में गंगा के खादर में दफना दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि उनका उद्देश्य साक्ष्य मिटाना था।
कोर्ट ने कहा,
"यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आरोपियों का उद्देश्य अपने द्वारा किए गए अपराध को छिपाना था।"
खंडपीठ ने कहा कि अपराध से पहले और बाद में आरोपियों का व्यवहार इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
घटना के बाद पुलिस को सूचना न देना, पंचनामा न कराना और शवों को छिपाने की नीयत से दफना देना भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत प्रासंगिक परिस्थितियां हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"आरोपियों का आचरण और व्यवहार बिना किसी संदेह के उनके दोषी मन की ओर संकेत करता है।"
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित की और यह श्रृंखला आरोपियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के अपराधी होने की संभावना को पूरी तरह समाप्त कर देती है।
कोर्ट ने यह भी माना कि दोनों नाबालिग बहनों की हत्या परिवार की कथित इज्जत और सम्मान के नाम पर की गई। निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और उसके फैसले में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों की अपील खारिज करते हुए उनकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।


