किसानों को राहत पर बड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- देरी के आधार पर दावा खारिज करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ

Amir Ahmad

13 April 2026 12:25 PM IST

  • किसानों को राहत पर बड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- देरी के आधार पर दावा खारिज करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसानों के हित में अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत दावे खारिज करना, बिना कारणों पर विचार किए, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

    जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि भले ही योजना में दावा दाखिल करने की अधिकतम समय सीमा 75 दिन निर्धारित हो, लेकिन यदि देरी के पीछे उचित कारण हों तो अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे उन कारणों पर विचार करें।

    अदालत ने स्पष्ट कहा,

    “यदि देरी के कारणों पर विचार ही नहीं किया जाता तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा। हर आवेदक को यह अधिकार है कि उसे अपनी देरी का स्पष्टीकरण देने का अवसर मिले।”

    मामला उन याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें किसानों के परिजनों के दावे सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दिए गए कि वे घटना के 75 दिन बाद दाखिल किए गए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना कल्याणकारी योजना है, जिसका उद्देश्य किसानों के परिवारों को आर्थिक सहायता देना है। खासकर तब जब वे अशिक्षित हों और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हों।

    अदालत ने यह भी कहा कि कई बार जरूरी दस्तावेज जुटाने में समय लगता है, जो देरी का उचित कारण हो सकता है। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर दावे खारिज करना उचित नहीं है। खासकर जब देरी सरकारी प्रक्रिया के कारण भी हो सकती है।

    अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि योजना में यदि अपील या अन्य उपाय का प्रावधान नहीं है तो पीड़ितों को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

    हाइकोर्ट ने कहा,

    “जब योजना का उद्देश्य कमजोर वर्ग को आर्थिक सहायता देना है तब उन्हें देरी का कारण बताने का अवसर देना उनके मूल अधिकार का हिस्सा है।”

    अंततः अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे देरी के कारण बताते हुए अतिरिक्त हलफनामा संबंधित प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत करें। साथ ही प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह सुनवाई का अवसर देकर कारणयुक्त आदेश पारित करे।

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