PITNDPS Act: हिरासत में लिए गए व्यक्ति को डिटेनिंग अथॉरिटी के पास प्रतिनिधित्व का अधिकार बताना जरूरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिरासत आदेश रद्द किया

  • PITNDPS Act: हिरासत में लिए गए व्यक्ति को डिटेनिंग अथॉरिटी के पास प्रतिनिधित्व का अधिकार बताना जरूरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिरासत आदेश रद्द किया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नशीली दवाओं और मन:प्रभावी पदार्थों की अवैध तस्करी रोकथाम अधिनियम (PITNDPS Act) के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना जरूरी है कि वह हिरासत का आदेश जारी करने वाले डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष भी अपना प्रतिनिधित्व कर सकता है। केवल राज्य सरकार के सामने प्रतिनिधित्व करने के अधिकार की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, भले ही हिरासत का आदेश जारी करने वाला अधिकारी किसी दूसरी हैसियत से राज्य सरकार की ओर से उस आदेश को रद्द करने की शक्ति रखता हो।

    जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने लोकेन्द्र के खिलाफ जारी हिरासत आदेश रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि लोकेन्द्र किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

    मामले में हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उस डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष प्रतिनिधित्व करने के अधिकार की जानकारी दी गई, जिसके पास हिरासत आदेश को वापस लेने की अलग और स्वतंत्र शक्ति होती है।

    29 जनवरी 2026 को जारी हिरासत आदेश में कहा गया कि लोकेन्द्र अपना प्रतिनिधित्व राज्य सरकार द्वारा गठित सलाहकार बोर्ड, भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के सचिव और उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के सचिव या प्रमुख सचिव के समक्ष कर सकता है। हालांकि, आदेश में डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष प्रतिनिधित्व करने के अधिकार की जानकारी नहीं दी गई।

    राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि हिरासत आदेश सुप्रीम कोर्ट के अल्फिया ए. बनाम केरल राज्य व अन्य मामले में तय कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप था। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

    बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के अल्फिया ए. फैसले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत निवारक हिरासत के मामलों में डिटेनिंग अथॉरिटी पर दो अलग-अलग जिम्मेदारियां होती हैं। पहली, हिरासत के आधार की जानकारी देना और दूसरी, हिरासत आदेश के खिलाफ जल्द से जल्द प्रतिनिधित्व करने का अवसर उपलब्ध कराना।

    कोर्ट ने कहा कि प्रतिनिधित्व करने का अवसर देने की यह संवैधानिक जिम्मेदारी अपने साथ यह दायित्व भी लेकर आती है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि वह किन व्यक्तियों या प्राधिकरणों के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व कर सकता है।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अल्फिया ए. मामले में स्पष्ट किया कि यदि हिरासत में लिया गया व्यक्ति अपनी ओर से डिटेनिंग अथॉरिटी को प्रतिनिधित्व दे भी देता है, तब भी केवल इस वजह से कानूनी खामी दूर नहीं हो जाती कि उसे पहले अलग से इस अधिकार की जानकारी नहीं दी गई। इस अधिकार की जानकारी देना डिटेनिंग अथॉरिटी की स्वतंत्र जिम्मेदारी है और यह इस बात पर निर्भर नहीं कर सकती कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति खुद इस अधिकार के बारे में जानता था या नहीं।

    हाईकोर्ट ने इसके बाद PITNDPS Act की धारा 12 के तहत हिरासत आदेश को रद्द करने और उसे वापस लेने के बीच के अंतर को समझाया। कोर्ट ने कहा कि सलाहकार बोर्ड, भारत सरकार के सचिव और राज्य सरकार के सचिव या प्रमुख सचिव हिरासत आदेश रद्द कर सकते हैं। लेकिन हिरासत आदेश को वापस लेने यानी उसे निरस्त करने की शक्ति केवल उसी डिटेनिंग अथॉरिटी के पास होती है जिसने मूल हिरासत आदेश जारी किया।

    बेंच ने कहा कि किसी वरिष्ठ प्राधिकरण द्वारा हिरासत आदेश रद्द किया जाना और डिटेनिंग अथॉरिटी द्वारा हिरासत आदेश वापस लिया जाना एक समान प्रक्रिया नहीं है। वरिष्ठ प्राधिकरण किसी आदेश को तब रद्द कर सकता है, जब वह अधिकार क्षेत्र के बिना जारी किया गया हो या उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, मनमानी अथवा प्रक्रिया संबंधी गंभीर खामी हो।

    इसके विपरीत, हिरासत आदेश वापस लेने की स्थिति तब पैदा हो सकती है जब आदेश जारी किए जाने के समय मौजूद परिस्थितियां बदल गई हों या हिरासत जारी रखना आवश्यक न रह गया हो। ऐसे मामले में कानून के तहत हिरासत आदेश वापस लेने की शक्ति डिटेनिंग अथॉरिटी के पास रहती है।

    कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण अंतर बताया कि यदि किसी वरिष्ठ प्राधिकरण द्वारा हिरासत आदेश रद्द कर दिया जाता है तो उसी तथ्यों के आधार पर डिटेनिंग अथॉरिटी के लिए नया हिरासत आदेश जारी करने की गुंजाइश नहीं रहती। वहीं, यदि डिटेनिंग अथॉरिटी खुद हिरासत आदेश वापस लेती है तो कानून की शर्तों के अधीन वह अलग आधार पर, और कुछ परिस्थितियों में उन्हीं तथ्यों के आधार पर भी नया हिरासत आदेश जारी कर सकती है।

    मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि हिरासत आदेश में जिस तीसरे प्राधिकरण का उल्लेख किया गया, वह उस समय डिटेनिंग अथॉरिटी के रूप में कार्य नहीं कर रहा था। वह राज्य सरकार के रूप में अपनी अलग भूमिका में हिरासत आदेश को रद्द करने की शक्ति रखता था।

    बेंच ने जोर देकर कहा कि लोकेन्द्र को विशेष रूप से यह बताया जाना चाहिए कि वह उस डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष भी अपना प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिसके पास हिरासत आदेश वापस लेने की शक्ति थी।

    कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को चार प्राधिकरणों के समक्ष प्रतिनिधित्व करने के अधिकार की जानकारी दी जानी चाहिए थी—सलाहकार बोर्ड, केंद्र सरकार, राज्य सरकार और डिटेनिंग अथॉरिटी। उसे पहले तीन प्राधिकरणों के संबंध में जानकारी तो दी गई थी, लेकिन डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष प्रतिनिधित्व करने के अधिकार के बारे में नहीं बताया गया।

    हाईकोर्ट ने माना कि इस तरह सुप्रीम कोर्ट के अल्फिया ए. मामले में निर्धारित सख्त कानूनी आवश्यकताओं का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने लोकेन्द्र की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर करते हुए उसके खिलाफ जारी हिरासत आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

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