फर्जी स्कूल प्रमाणपत्र से नाबालिग दिखाकर POCSO Act के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से दिशानिर्देश मांगे

Amir Ahmad

22 Aug 2026 4:57 PM IST

  • फर्जी स्कूल प्रमाणपत्र से नाबालिग दिखाकर POCSO Act के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से दिशानिर्देश मांगे

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO Act के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को स्कूलों की ओर से जारी होने वाले जन्मतिथि प्रमाणपत्रों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने का निर्देश दिया।

    अदालत ने ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जहां पीड़िताओं को 18 वर्ष से कम उम्र का दिखाने के लिए कथित तौर पर फर्जी स्थानांतरण प्रमाणपत्र या स्कूल प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया गया।

    अदालत के अनुसार इससे कई युवकों के खिलाफ गलत तरीके से POCSO कानून के तहत मामले दर्ज होने की स्थिति बनती है और उन्हें जमानत हासिल करने में भी मुश्किल होती है।

    जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने एक पॉक्सो मामले में आरोपी को जमानत देते हुए यह आदेश दिया।

    अदालत के सामने पीड़िता की उम्र को लेकर विरोधाभासी दस्तावेज सामने आए। अस्थि परीक्षण में उसकी उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई जबकि स्कूल छोड़ने के प्रमाणपत्र में जन्मतिथि 12 नवंबर 2012 दर्ज थी। इस जन्मतिथि के आधार पर पीड़िता नाबालिग मानी जाती।

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापक को मूल रिकॉर्ड के साथ पेश होने का निर्देश दिया। प्रधानाध्यापक ने बताया कि स्कूल में पीड़िता की जन्मतिथि एक ऐसे स्थानांतरण प्रमाणपत्र के आधार पर दर्ज की गई थी जो कथित तौर पर ग्राम समाज जूनियर हाईस्कूल की ओर से जारी किया गया।

    अदालत के निर्देश पर जांच अधिकारी ने उस प्रमाणपत्र की सत्यता की जांच की। ग्राम समाज जूनियर हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक ने स्पष्ट किया कि पीड़िता का उस स्कूल में कभी दाखिला ही नहीं हुआ था और कथित स्थानांतरण प्रमाणपत्र भी स्कूल ने जारी नहीं किया।

    इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2023 में कथित तौर पर तैयार किया गया स्थानांतरण प्रमाणपत्र फर्जी था। इसलिए उस प्रमाणपत्र के आधार पर तैयार स्कूल छोड़ने के प्रमाणपत्र को पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस देशवाल ने कहा कि अदालत के सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें पीड़िताओं को 18 वर्ष से कम उम्र का दिखाने के लिए अभिभावकों की ओर से कथित तौर पर फर्जी स्कूल प्रमाणपत्र, स्थानांतरण प्रमाणपत्र या प्रधानाध्यापक के नाम से जारी बताए गए पत्र पेश किए गए।

    अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी घटनाएं POCSO Act के स्पष्ट दुरुपयोग की ओर संकेत करती हैं, खासकर उन मामलों में जहां लड़की खुद किसी युवक के साथ प्रेम संबंध के कारण घर छोड़कर चली गई हो और बाद में उसके माता-पिता युवक को सजा दिलाने के लिए उसकी उम्र नाबालिग साबित करने का प्रयास करें।

    हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में पीड़िता के पास मैट्रिक या उसके समकक्ष परीक्षा का प्रमाणपत्र नहीं होता वहां स्कूल की ओर से जारी जन्मतिथि संबंधी प्रमाणपत्र उम्र निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है। ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने के लिए तय प्रारूप और प्रक्रिया का अभाव कथित तौर पर गलत इस्तेमाल का कारण बन रहा है।

    अदालत ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (POCSO Act) की धारा 94(2) का भी उल्लेख किया। इसके तहत उम्र निर्धारित करते समय सबसे पहले स्कूल या मैट्रिक अथवा समकक्ष प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि पर विचार किया जाता है। ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर नगर निगम नगरपालिका या पंचायत की ओर से जारी जन्म प्रमाणपत्र देखा जाता है। इन दस्तावेजों के अभाव में ही अस्थि परीक्षण या उम्र निर्धारित करने वाली अन्य नवीनतम मेडिकल जांच का सहारा लिया जाता है।

    मौजूदा मामले में चूंकि संबंधित स्थानांतरण प्रमाणपत्र फर्जी पाया गया, इसलिए उस पर आधारित स्कूल छोड़ने के प्रमाणपत्र को भी भरोसेमंद नहीं माना जा सकता था।

    अदालत ने कहा कि किसी अन्य वैध दस्तावेज के अभाव में उम्र निर्धारित करने के लिए अस्थि परीक्षण ही उपलब्ध विकल्प रह जाता है।

    हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं करने वाले छात्रों के लिए स्कूलों की ओर से जारी किए जाने वाले जन्मतिथि प्रमाणपत्रों के संबंध में दो महीने के भीतर आवश्यक दिशानिर्देश जारी किए जाएं। इन दिशानिर्देशों में प्रमाणपत्र जारी करने का निर्धारित प्रारूप और दाखिले के समय माता-पिता या अभिभावकों द्वारा जमा किए जाने वाले दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

    मामले में आरोपी ने जमानत के लिए यह भी बताया था कि पीड़िता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 180 और 183 के तहत अपने बयान में कहा कि वह खुद घर से गई और बाद में अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई, क्योंकि दोनों के बीच संबंध थे।

    आरोपी ने अस्थि परीक्षण में पीड़िता की उम्र 18 से 20 वर्ष आने, चिकित्सकीय जांच में किसी चोट के नहीं मिलने अपने खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं होने और आरोपपत्र दाखिल हो जाने का भी हवाला दिया।

    राज्य और शिकायतकर्ता ने जमानत का विरोध किया लेकिन इन तथ्यों को खारिज नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी की जमानत मंजूर की। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय उसने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।

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