सत्ता के अहंकार' का मामला: 5 दिन तक अवैध हिरासत में रखने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1.25 लाख रुपये मुआवजा दिया
Amir Ahmad
2 Nov 2026 12:11 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक युवक को पांच दिन तक अवैध पुलिस हिरासत में रखने के मामले में 1.25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने जांच अधिकारी के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि उसने कानून के तहत तय प्रक्रिया का पालन किए बिना युवक को हिरासत में रखकर 'सत्ता का अहंकार' दिखाया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने ज्ञानती देवी और दो अन्य की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। याचिका में चंदन राजभर को रिहा करने की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने अवैध हिरासत के प्रत्येक दिन के लिए 25 हजार रुपये के हिसाब से कुल 1.25 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मुआवजे के अलावा राजभर पुलिस विभाग के खिलाफ हर्जाने के लिए अलग से दीवानी मुकदमा दायर कर सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच में जांच अधिकारी आरोपों का दोषी पाया जाता है तो उसके जानबूझकर किए गए कृत्य के लिए सबसे कड़ी सजा देने पर विचार किया जाना चाहिए।
मामले के अनुसार, 18 जुलाई 2026 को देवरिया के सलेमपुर थाने में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता, जो याचिकाकर्ता नंबर 3 की मां हैं, ने आरोप लगाया था कि चंदन राजभर उनकी 18 वर्षीय बेटी को भगाकर ले गया।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, बाद में चंदन राजभर और युवती ने बिहार के सिवान स्थित दुर्गा मंदिर में शादी कर ली और पुणे चले गए, जहां दोनों पति-पत्नी के रूप में रह रहे थे।
आरोप था कि 24 और 25 अगस्त की मध्यरात्रि को पुलिसकर्मी युवती के पिता के साथ उनके वैवाहिक आवास पर पहुंचे और दोनों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद उन्हें 27 और 28 अगस्त की मध्यरात्रि में संबंधित थाने लाया गया।
राजभर का कहना था कि उन्हें 28 अगस्त से 2 सितंबर 2026 तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उनकी गिरफ्तारी का मेमो केवल 2 सितंबर को तैयार किया गया।
हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर को पारित आदेश में पुलिस को 27 अगस्त शाम 6 बजे से 2 सितंबर रात 10 बजे तक थाने की CCTV रिकॉर्डिंग पेश करने का निर्देश दिया। पुलिस ने रिकॉर्डिंग पेश की, लेकिन राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट का ध्यान 21 अक्टूबर की जांच रिपोर्ट की ओर दिलाया। यह रिपोर्ट क्षेत्राधिकारी ने तैयार कर पुलिस अधीक्षक, देवरिया को भेजी थी। इसके बाद कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज देखने की आवश्यकता नहीं समझी।
जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि जांच अधिकारी दीप नारायण यादव ने 28 अगस्त को जानबूझकर राजभर को हिरासत में लिया और 2 सितंबर तक अवैध रूप से थाने में रखा। इसके बाद उनकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई गई और उन्हें रिमांड के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि जांच अधिकारी ने लापरवाही बरती और अपने कर्तव्यों का गंभीर उल्लंघन किया। इसके बाद 21 अक्टूबर को पुलिस अधीक्षक, देवरिया ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की।
हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट के जरिए वास्तविक तथ्यों का खुलासा करने के लिए क्षेत्राधिकारी की सराहना की। बेंच ने कहा कि क्षेत्राधिकारी ने ईमानदारी और स्पष्टवादिता के साथ अदालत के सामने सही स्थिति रखी। पुलिस अधीक्षक की ओर से जांच अधिकारी के खिलाफ की गई कार्रवाई की भी कोर्ट ने सराहना की।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस की पूरी कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता का अवैध हिरासत में रखे जाने का आरोप स्वीकार किया गया है।
मुआवजे के सवाल पर हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के रवैये की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना पूरे पांच दिन तक राजभर को हिरासत में रखा। उसके आचरण से ऐसा लगता है कि वह इसे सामान्य पुलिस कार्यवाही मान रहा था और उसे अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर कोई संकोच नहीं था।
हाईकोर्ट ने माना कि राजभर पांच दिनों तक कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में रहे। इसलिए उन्हें प्रत्येक दिन के लिए 25 हजार रुपये के हिसाब से कुल 1.25 लाख रुपये मुआवजा दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जांच के बाद अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले व्यक्तियों से मुआवजे की रकम वसूलने पर राज्य सरकार विचार कर सकती है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि राजभर किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
कोर्ट ने राज्य सरकार से क्षेत्राधिकारी राजेश चतुर्वेदी और देवरिया के पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर की उनके सेवा रिकॉर्ड में सराहना दर्ज करने का भी अनुरोध किया। कोर्ट के मुताबिक, दोनों अधिकारियों ने जांच अधिकारी की कार्रवाई के बारे में पूरी और सही जानकारी अदालत के सामने रखी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों का राजभर के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ट्रायल कोर्ट मामले का फैसला उसके सामने पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर करेगा और हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगा।

