लापरवाह और निराधार आरोप: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने वकील के कहने पर NBW जारी होने के दावे पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया

Amir Ahmad

7 Feb 2026 5:04 PM IST

  • लापरवाह और निराधार आरोप: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने वकील के कहने पर NBW जारी होने के दावे पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया

    इलाहाबाद हाइकोर्ट ने ट्रायल जज पर बेहद गंभीर और निराधार आरोप लगाने वाले दो अभियुक्तों के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उनकी ट्रांसफर याचिका खारिज की। साथ ही उन पर 1 लाख रुपये का भारी जुर्माना (कॉस्ट) लगाया। हाइकोर्ट ने कहा कि यह दावा पूरी तरह लापरवाह, आधारहीन और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है।

    जस्टिस समीत गोपाल की एकल पीठ ने यह आदेश उन अभियुक्तों के खिलाफ पारित किया, जिन्होंने आरोप लगाया कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता के भाई जो कि एक वकील है, उनके कहने पर उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया।

    कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,

    “उक्त अनुच्छेद को आवेदक नंबर-2 ओम प्रकाश द्वारा अभिलेखों के अवलोकन के आधार पर शपथपूर्वक कहा गया, जबकि अभिलेखों में ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है जो इस आरोप की पुष्टि करता हो। अतः ये आरोप पूरी तरह लापरवाह और निराधार हैं।”

    मामले की पृष्ठभूमि

    शिवम सुंदर और ओम प्रकाश नामक अभियुक्तों ने झांसी स्थित अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) / अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत को किसी अन्य अदालत में ट्रांसफर किए जाने की मांग को लेकर हाइकोर्ट का रुख किया।

    यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 387 (जबरन वसूली), 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 504 (शांति भंग करने के उद्देश्य से अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) से संबंधित है।

    याचिका में आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता का सगा भाई जो झांसी जिला अदालत में प्रैक्टिस करने वाला वकील है, उसने ट्रायल जज से उनके चैंबर में मुलाकात की और उसी के प्रभाव में नवंबर में अभियुक्तों के खिलाफ NBW जारी किया गया।

    रिकॉर्ड में आरोपों का कोई आधार नहीं

    हाइकोर्ट ने हलफनामे और न्यायिक रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट रूप से कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई भी तथ्य नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि ट्रायल कोर्ट का आदेश किसी बाहरी प्रभाव या निजी मुलाकात के आधार पर पारित किया गया।

    कोर्ट ने राज्य की ओर से दी गई इस दलील से भी सहमति जताई कि हलफनामे की सामग्री अवमाननापूर्ण प्रकृति की है। इससे न्यायिक अधिकारी की निष्पक्षता पर बिना किसी आधार के सवाल उठाया गया।

    कार्यवाही टालने की कोशिश पर भी नाराज़गी

    हाइकोर्ट ने यह भी नोट किया कि अभियुक्त न्यायिक प्रक्रिया को टालने की रणनीति अपना रहे हैं। इससे पहले हाइकोर्ट की समन्वय पीठ ने उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द करने से इनकार किया और उन्हें तय समय-सीमा के भीतर डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने की छूट दी। साथ ही डिस्चार्ज अर्जी के निस्तारण तक उन्हें किसी भी दमनात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण भी दिया गया।

    इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट द्वारा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद अभियुक्तों ने डिस्चार्ज अर्जी दाखिल नहीं की और इसके स्थान पर ट्रांसफर याचिका दाखिल की।

    इस पर जस्टिस गोपाल ने कहा,

    “मुकदमे की वर्तमान स्थिति डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने और आरोप तय किए जाने की, किंतु अभियुक्तों ने आज तक डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करना उचित नहीं समझा।”

    1 लाख रुपये का जुर्माना और वसूली का आदेश

    इन सभी तथ्यों के आधार पर हाइकोर्ट ने ट्रांसफर याचिका खारिज करते हुए 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि यह राशि जमा नहीं की गई तो ट्रायल कोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश देगा कि इसे भू-राजस्व की तरह तत्काल वसूल किया जाए।

    ट्रायल कोर्ट के आदेश की अपठनीयता पर भी सख्त टिप्पणी

    इसके अतिरिक्त हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश की लिखावट को लेकर भी गहरी नाराज़गी जताई। जस्टिस गोपाल ने कहा कि प्रस्तुत आदेश मात्र पांच पंक्तियों का था जिसमें तारीख और NBW शब्द के अलावा कुछ भी पढ़ा नहीं जा सका।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    “यह कोर्ट न्यायिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बार-बार निर्देश जारी कर चुका है कि ट्रायल कोर्ट अपने आदेश स्पष्ट और पढ़ने योग्य तरीके से लिखें, लेकिन इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने बिना यह देखे कि आदेश पढ़ने योग्य है या नहीं, उस पर हस्ताक्षर कर दिए।”

    इसके चलते हाइकोर्ट ने डिस्ट्रिक्ट एवं सेशन जज झांसी को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि संबंधित ट्रायल कोर्ट भविष्य में स्पष्ट और पठनीय आदेश पारित करे और इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

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