निजी परिसर में नमाज रोकने का आरोप: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने बरेली के DM और SSP को अवमानना नोटिस जारी किया
Amir Ahmad
17 Feb 2026 3:54 PM IST

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने बरेली के जिलाधिकारी (DM) रवींद्र कुमार और सीनियर पुलिस अधीक्षक (SSP) अनुराग आर्य को अवमानना का नोटिस जारी किया। अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने याचिकाकर्ता और अन्य लोगों को निजी घर के अंदर नमाज अदा करने से रोका, जो कि हाइकोर्ट के पिछले आदेशों का सीधा उल्लंघन प्रतीत होता है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अधिकारियों का यह कदम हाइकोर्ट द्वारा 27 जनवरी को 'मरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में दिए गए आदेश की अवहेलना है।
संविधान और पिछले फैसलों का संदर्भ
'मरानाथ' मामले में इसी बेंच ने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत, किसी भी नागरिक को अपनी निजी संपत्ति या निजी परिसर के भीतर धार्मिक प्रार्थना करने के लिए कानून के तहत किसी भी प्रकार की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। यह नागरिक का मौलिक अधिकार है और राज्य ने भी पहले यह स्वीकार किया कि निजी परिसरों में धार्मिक प्रार्थना सभा आयोजित करने पर कोई रोक नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस कार्रवाई
याचिकाकर्ता तारिक खान ने अपनी याचिका में बताया कि उन्हें और कुछ अन्य लोगों को 16 जनवरी को पुलिस ने एक खाली घर में नमाज पढ़ने के आरोप में हिरासत में लिया। उनके खिलाफ शांति भंग की आशंका के तहत कार्रवाई की गई। हाइकोर्ट के 27 जनवरी के फैसले के बाद याचिकाकर्ता ने जनवरी और फरवरी में DM और SSP को प्रतिवेदन देकर आगामी रमजान के महीने में उसी निजी परिसर में प्रार्थना करने की अनुमति मांगी थी। याचिकाकर्ता के वकील राजेश कुमार गौतम ने तर्क दिया कि हाइकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद अधिकारियों ने इन आवेदनों को लंबित रखा और धार्मिक अनुष्ठान में बाधा उत्पन्न करना जारी रखा।
अदालत का आदेश और अगली सुनवाई
अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए बरेली के शीर्ष अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। बेंच ने राज्य सरकार के वकील को निर्देश दिया कि वे इस मामले में तुरंत अधिकारियों से निर्देश प्राप्त करें। अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए यह भी निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक रहेगी।
इस मामले को अब 11 मार्च को शीर्ष दस मामलों की सूची में सुनवाई के लिए रखा गया। यह आदेश पुनः स्थापित करता है कि निजी स्थानों पर धार्मिक आचरण एक संवैधानिक अधिकार है और प्रशासन इसमें बिना किसी ठोस कानूनी आधार के हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

