उम्र सत्यापन में लापरवाही पर सख्त हुआ इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ के आर्य समाज मंदिर में विवाह कराने और प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक

Amir Ahmad

5 Aug 2026 7:36 PM IST

  • उम्र सत्यापन में लापरवाही पर सख्त हुआ इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ के आर्य समाज मंदिर में विवाह कराने और प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह पाए जाने के बाद कि लखनऊ के अलीगंज स्थित एक आर्य समाज मंदिर में विवाह योग्य आयु का सत्यापन किए बिना विवाह कराए जा रहे हैं, अगली सुनवाई तक मंदिर को विवाह संपन्न कराने और विवाह प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगाई।

    जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश दंपति द्वारा विवाह के बाद पुलिस सुरक्षा की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने आर्य समाज मंदिर, सेक्टर-एच (हर्ष विहार पुरनिया), अलीगंज, लखनऊ द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र में दर्ज आयु को लेकर विसंगति पाई। अदालत ने पाया कि विवाह प्रमाणपत्र में पुरुष याचिकाकर्ता की आयु 22 वर्ष दर्ज थी, जबकि उसके आधार कार्ड के अनुसार उसकी आयु लगभग 19 वर्ष थी।

    इस पर अदालत ने मंदिर के प्रमुख से स्पष्टीकरण मांगा। बाद में संस्था के सचिव स्वयं अदालत में उपस्थित हुए और विवाह रजिस्टर के साथ याचिकाकर्ताओं तथा पुरुष याचिकाकर्ता की मां के शपथपत्र प्रस्तुत किए।

    सचिव ने बताया कि याचिकाकर्ता की मां ने शपथपत्र देकर अपने पुत्र की आयु लगभग 22 वर्ष बताई। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि विवाह संपन्न कराने से पहले आयु का कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

    जब अदालत ने पूछा कि आधार कार्ड या अन्य दस्तावेज मांगे बिना केवल शपथपत्र के आधार पर आयु कैसे स्वीकार कर ली गई, तो सचिव कोई वैधानिक प्रावधान या नियम नहीं बता सके।

    उन्होंने यह भी कहा कि संस्था किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) की धारा 94 के आधार पर विवाह कराती है, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि उक्त प्रावधान के तहत शपथपत्र स्वीकार्य नहीं है तथा बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार पुरुष की विवाह योग्य आयु 21 वर्ष है।

    अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं और उनकी मां के सभी शपथपत्र पहले से छपे हुए प्रारूप पर तैयार थे। अदालत ने कहा कि इससे प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे प्रारूप इस उद्देश्य से तैयार किए गए हैं ताकि संस्था में आने वाले किसी भी व्यक्ति का विवाह कराया जा सके।

    खंडपीठ ने विवाह रजिस्टर का भी अवलोकन किया और पाया कि उसकी सभी प्रविष्टियां एक ही कलम और एक जैसी लिखावट में दर्ज प्रतीत होती हैं। हालांकि संस्था के सचिव ने कहा कि सभी प्रविष्टियां एक ही व्यक्ति द्वारा की जाती हैं, लेकिन अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि संस्था विवाह योग्य आयु का समुचित सत्यापन किए बिना विवाह करा रही है।

    अदालत ने कहा,

    "प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि इस संस्था में संबंधित व्यक्तियों की आयु तथा उनके विवाह योग्य होने का सत्यापन किए बिना विवाह संपन्न कराए जा रहे हैं। यदि विवाह योग्य आयु से कम व्यक्तियों का विवाह कराया जाता है तो इसमें शामिल सभी लोग अपराध के भागीदार होंगे।"

    खंडपीठ ने यह भी कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज का मूल सिद्धांत सत्य को स्वीकार करना और असत्य का त्याग करना है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ आर्य समाज संस्थाएं इन सिद्धांतों का पालन नहीं कर रही हैं और वर्तमान मामला भी ऐसा ही एक उदाहरण है।

    याचिकाकर्ताओं की पुलिस सुरक्षा की मांग पर अदालत ने कहा कि यह केवल आशंका पर आधारित है। अदालत ने पाया कि पुलिस आयुक्त को दिए गए प्रार्थना पत्र में उन आरोपों का उल्लेख नहीं था, जो बाद में रिट याचिका में लगाए गए। उसमें केवल यह आशंका जताई गई थी कि महिला के माता-पिता पति और उसके परिवार के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करा सकते हैं।

    अदालत ने कहा कि फिलहाल किसी वास्तविक धमकी या उत्पीड़न का कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर नहीं है। यदि भविष्य में ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो याचिकाकर्ता संबंधित थाना और उच्च पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं, जिन्हें लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करनी होगी।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने आर्य समाज मंदिर को प्रतिवादी बनाने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि जब तक संस्था शपथपत्र के माध्यम से यह आश्वासन नहीं देती कि वह विवाह कराने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करेगी और दोनों पक्षों की विवाह योग्य आयु का विधिवत सत्यापन किए बिना कोई विवाह नहीं कराएगी, तब तक उसे विवाह संपन्न कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    इन्हीं परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि अगले आदेश तक लखनऊ के उक्त आर्य समाज मंदिर में कोई विवाह नहीं कराया जाएगा और न ही कोई विवाह प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।

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