गिरफ्तारी के आधार न बताने की चुनौती धारा 167 के चरण तक ही, आरोप तय होने के बाद नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Oct 2026 4:26 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार की जानकारी नहीं दिए जाने से जुड़ी प्रारंभिक गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 167 के तहत चलने वाले चरण के दौरान ही दी जा सकती है। आरोप तय होने और मुकदमे की कार्यवाही शुरू हो जाने के बाद इस आधार पर प्रारंभिक गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती नहीं दी जा सकती।
जस्टिस मनीष माथुर ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें ऐसे आरोपी की औपचारिक गिरफ्तारी और उसके बाद दिए गए रिमांड आदेशों को चुनौती दी गई, जो पहले से ही एक अन्य प्राथमिकी के सिलसिले में हिरासत में है।
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य में गिरफ्तारी के आधार बताए जाने की, जो संवैधानिक आवश्यकता निर्धारित की गई, वह धारा 167 के तहत प्रारंभिक गिरफ्तारी और रिमांड के चरण से संबंधित है। इसे आपराधिक कार्यवाही के बाद के चरणों पर लागू नहीं किया जा सकता।
याचिका पर विचार के समय तक आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, संज्ञान लिया जा चुका है, आरोप तय किए जा चुके हैं और मुकदमे की सुनवाई शुरू हो गई। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।
आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 148, 152 और 61(2) के तहत FIR दर्ज की गई। उस समय वह पहले से ही एक अन्य FIR के मामले में जेल में uw। आतंकवाद निरोधक दस्ते ने उसे पेशी वारंट के जरिए अदालत के सामने पेश करने की मांग की। इसके बाद पेशी वारंट पर उसे दूसरे मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया। उसे पहले न्यायिक हिरासत और बाद में पुलिस हिरासत में भेजा गया।
आरोपी ने अपनी औपचारिक गिरफ्तारी और रिमांड आदेशों को चुनौती देते हुए कहा कि उसे गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए। उसके अनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 22(1) में दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन है इसलिए रिमांड आदेश भी रद्द किए जाने चाहिए।
राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि आरोपी पहले से ही एक अन्य मामले में हिरासत में है और दूसरे मामले में केवल हिरासत में बदलाव हुआ। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि बाद में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और अदालत संज्ञान ले चुकी है, इसलिए पुराने रिमांड को अब चुनौती देना प्रासंगिक नहीं रह गया।
हाईकोर्ट ने पहले यह स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पहले से हिरासत में होने के बावजूद उसे दूसरे अपराध के संबंध में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया जा सकता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले धनराज असवानी बनाम अमर एस. मुलचंदानी का हवाला देते हुए कहा कि अपराध के मामले में हिरासत में मौजूद व्यक्ति को दूसरे अपराध के संबंध में भी गिरफ्तार किया जा सकता है।
हालांकि, ऐसी गिरफ्तारी के दौरान संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 48(2) के तहत सुरक्षा उपायों का पालन करना जरूरी है। इसका अर्थ है कि नई गिरफ्तारी के आधार आरोपी को बताए जाने चाहिए।
कोर्ट ने विहान कुमार के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना अनुच्छेद 22(1) की अनिवार्य आवश्यकता है। इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी और उसके परिणामस्वरूप दिए गए रिमांड आदेश प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि इससे जांच, आरोपपत्र या मुकदमे की पूरी कार्यवाही स्वतः अमान्य नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार बताए जाने की सुरक्षा प्रारंभिक गिरफ्तारी और धारा 167 के तहत रिमांड के चरण से जुड़ी है। आरोपपत्र दाखिल होने और अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद स्थिति अलग हो जाती है।
कोर्ट ने समझाया कि जांच के दौरान प्रारंभिक हिरासत और रिमांड CrPC की धारा 167 के तहत होता है। लेकिन आरोपपत्र दाखिल होने और अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद धारा 207 लागू होती है, जिसके तहत आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और अन्य संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बाद परिस्थितियों के अनुसार आगे की हिरासत धारा 209 या 309 के तहत हो सकती है।
कोर्ट ने कहा कि धारा 207 का पालन हो जाने के बाद आरोपी को अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों और जांच के नतीजे की जानकारी हो जाती है। इसलिए उस चरण पर उसे फिर से गिरफ्तारी के कारण और आधार बताना आवश्यक नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
“स्पष्ट रूप से, एक बार CrPC की धारा 207 का पालन हो जाने के बाद आरोपी को अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों और जांच के परिणाम की जानकारी होती है। इस चरण में यह नहीं कहा जा सकता कि उसे संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारण और आधार फिर से बताए जाने आवश्यक हैं।”
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अनुच्छेद 22(1) की यह आवश्यकता धारा 207 के बाद भी लागू मानी जाए तो इससे धारा 207 निरर्थक हो जाएगी, जो विधायिका का उद्देश्य नहीं हो सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 22(1) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों और आधार के संबंध में अंधेरे में न रखा जाए, ताकि वह या उसके परिवार के सदस्य प्रभावी कानूनी बचाव के लिए आवश्यक कदम उठा सकें।
हाईकोर्ट ने कहा कि विहान कुमार के फैसले में CrPC की धाराओं 204, 207, 209 या 309 पर विचार नहीं किया गया था। इसलिए उस फैसले को धारा 167 के चरण तक ही लागू माना जा सकता है और धारा 207 लागू होने के बाद नहीं।
कोर्ट ने कहा कि विहान कुमार और हिरासत तथा रिमांड से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है।
मौजूदा मामले में आरोपपत्र 25 नवंबर 2025 को दाखिल हुआ और 27 जनवरी 2026 को अदालत ने संज्ञान लिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के आधार पर प्रारंभिक हिरासत और रिमांड को चुनौती देने के समय तक CrPC की धारा 167 का चरण समाप्त हो चुका है।
कोर्ट ने निष्कर्ष दिया,
“प्रारंभिक हिरासत और प्रारंभिक रिमांड आदेश को अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के आधार पर केवल धारा 167 के अस्तित्व वाले चरण तक ही चुनौती दी जा सकती है, उसके बाद नहीं।”
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ के नीरज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले पर भी भरोसा किया। इसमें राज्य ने तर्क दिया था कि आरोपपत्र दाखिल होने और संज्ञान लिए जाने के बाद पहले के रिमांड को चुनौती नहीं दी जा सकती।
जस्टिस मनीष माथुर ने मौजूदा मामले को नीरज फैसले से अलग माना। कोर्ट ने कहा कि नीरज मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए हिरासत को चुनौती दी गई, जबकि मौजूदा मामले में BNSS की धारा 528 के तहत गिरफ्तारी और रिमांड की वैधता को सीधे चुनौती दी गई।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

