काम के बोझ की आड़ नहीं ले सकते: रिमांड में मजिस्ट्रेट की लापरवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार करने का निर्देश
Amir Ahmad
19 Oct 2026 11:20 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिमांड की अर्जियों की उचित जांच किए बिना आरोपियों को नियमित रूप से पुलिस या न्यायिक हिरासत में भेजने की घटनाओं पर चिंता जताते हुए ज्यूडिशियल ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (JTRI) लखनऊ को मजिस्ट्रेटों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने और जल्द-से-जल्द उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट रिमांड की कार्यवाही के दौरान न्यायिक काम के अत्यधिक बोझ का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, क्योंकि ऐसे मामलों का सीधा संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले मौलिक अधिकारों से है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने चेतावनी दी कि भविष्य में मजिस्ट्रेटों की ओर से कर्तव्य की ऐसी उपेक्षा को हाईकोर्ट गंभीरता से लेगा और जरूरत पड़ने पर प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश भी की जा सकती है।
कोर्ट ने ये टिप्पणियां अरविंद पांडेय और एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं। याचिका में साइबर धोखाधड़ी के एक मामले में अरविंद पांडेय की हिरासत को चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी के मेमो में महत्वपूर्ण जानकारियों की गंभीर कमी पाए जाने के बाद उन्हें रिहा करने का आदेश दिया।
याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पहले कुशीनगर के जिला जज से यह स्पष्टीकरण मांगा था कि गिरफ्तारी मेमो में कमियां होने के बावजूद आरोपी को रिमांड पर कैसे भेज दिया गया। 3 अक्टूबर, 2026 को दिए गए अपने स्पष्टीकरण में संबंधित मजिस्ट्रेट ने गलती स्वीकार करते हुए कोर्ट से माफी मांगी। उन्होंने कहा कि न्यायिक काम, खासकर जमानत अर्जियों के अत्यधिक बोझ के कारण वह पुलिस की रिमांड अर्जी की आवश्यक सतर्कता के साथ जांच नहीं कर सके।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया। बेंच ने कहा कि रिमांड से जुड़ा दायित्व “बेहद महत्वपूर्ण” है और इसका सीधा संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट न्यायिक काम के बोझ की आड़ नहीं ले सकते।
बेंच ने कहा,
“रिमांड के मामले भी न्यायिक कार्य का ही हिस्सा हैं, क्योंकि इनमें मजिस्ट्रेट को अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है। जरूरत पड़ने पर किसी विशेष मामले में रिमांड देने से इनकार भी किया जा सकता है और आवश्यक होने पर आरोपी को निजी मुचलके पर रिहा किया जा सकता है।”
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिमांड अर्जी को महज औपचारिकता समझकर नियमित तरीके से निपटा दिया। यदि उन्होंने उचित सतर्कता बरती होती, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
बेंच ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट की यह चूक कोई अकेली घटना नहीं थी। कोर्ट ने गौर किया कि कई मामलों में मजिस्ट्रेट, जिनसे सतर्क प्रहरी की तरह काम करने की अपेक्षा की जाती है, अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहे हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए हाईकोर्ट ने लखनऊ स्थित JTRI के निदेशक को निर्देश दिया कि वह इस मामले पर तत्काल ध्यान दें, मजिस्ट्रेटों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करें और उन्हें जल्द से जल्द प्रसारित करें।
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी का गिरफ्तारी मेमो महत्वपूर्ण विवरणों के लिहाज से “गंभीर रूप से अधूरा” है। अभियोजन का आरोप है कि आरोपी का बैंक खाता एक म्यूल अकाउंट है, जिसके माध्यम से सह-आरोपियों ने साइबर धोखाधड़ी से प्राप्त धनराशि का लेनदेन किया।
कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के कारण, जब्त सामग्री का विवरण, संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और आरोपी के निकटतम परिजनों की जानकारी जैसे महत्वपूर्ण विवरण या तो खाली छोड़े गए या पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं किए गए। बेंच ने माना कि गिरफ्तारी मेमो में ये कमियां सुप्रीम कोर्ट के विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामलों में दिए गए फैसलों के अनुरूप नहीं थीं।
हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी मेमो में बार-बार सामने आ रही ऐसी कमियों पर भी चिंता जताई।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस जानबूझकर ऐसा कर रही है ताकि आरोपी उस गलती का लाभ उठाकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से रिहाई का आदेश हासिल कर सके। ऐसा उन मामलों में भी हो सकता है जहां यदि गिरफ्तारी मेमो सही तरीके से भरा गया होता तो शायद जमानत भी नहीं मिलती।"
याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता नंबर एक को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उनकी हिरासत आवश्यक न हो।

