मथुरा-वृंदावन में भगदड़ रोकने के लिए भीड़ व्यवहार विज्ञान अपनाने की जरूरत, राज्य सरकार को कदम उठाने चाहिए: हाईकोर्ट

Amir Ahmad

3 Aug 2026 5:09 PM IST

  • मथुरा-वृंदावन में भगदड़ रोकने के लिए भीड़ व्यवहार विज्ञान अपनाने की जरूरत, राज्य सरकार को कदम उठाने चाहिए: हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा-वृंदावन में धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाली भीड़ और भगदड़ की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि लोगों के जीवन की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। कोर्ट ने कहा कि भीड़ व्यवहार विज्ञान को शिक्षा, प्रशासन और सरकारी नीतियों का हिस्सा बनाना समय की जरूरत ही नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता है।

    जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार केवल राज्य द्वारा हिंसा न करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह राज्य पर यह सकारात्मक जिम्मेदारी भी डालता है कि वह ऐसी परिस्थितियां विकसित करे, जिनसे प्रशासनिक या बौद्धिक तैयारी की कमी के कारण होने वाली रोकी जा सकने वाली त्रासदियों में लोगों की जान न जाए।

    कोर्ट ने कहा,

    "भीड़ व्यवहार विज्ञान को शिक्षा, प्रशासन और नीति निर्माण में संस्थागत रूप देना संवैधानिक आवश्यकता है। राज्य सरकार को इस दिशा में गंभीरता, तत्परता और प्रतिबद्धता के साथ कदम उठाने चाहिए।"

    मामले की सुनवाई मूल रूप से मथुरा-वृंदावन में निर्माण ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर हो रही थी। याचिकाकर्ता स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज ने दावा किया कि वृंदावन खादर क्षेत्र में उनकी जमीन पर आश्रम निर्माण की योजना को विकास प्राधिकरण ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बताते हुए अस्वीकार किया था। इसके बावजूद निर्माण होने पर प्राधिकरण ने ध्वस्तीकरण का आदेश पारित कर दिया, जिसे अपील में भी बरकरार रखा गया।

    सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले का दायरा बढ़ाते हुए जिला प्रशासन से पूछा कि क्या मथुरा-वृंदावन में धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ और आपदा प्रबंधन के लिए कोई वैज्ञानिक योजना मौजूद है। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या भीड़ के व्यवहार पर किसी विशेषज्ञ संस्था से अध्ययन कराया गया।

    प्रशासन ने अदालत को बताया कि भीड़ प्रबंधन के लिए समन्वय बैठकें, एकतरफा यातायात व्यवस्था, बैरिकेडिंग, बांके बिहारी मंदिर में अलग प्रवेश और निकास द्वार, दर्शन का समय बढ़ाना, सीसीटीवी निगरानी, वृंदावन को पांच यातायात क्षेत्रों में बांटना और दस वर्षीय मास्टर प्लान जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं।

    हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि उसका उद्देश्य यातायात व्यवस्था की प्रभावशीलता का परीक्षण करना नहीं था, बल्कि यह देखना था कि भीड़ प्रबंधन वैज्ञानिक आधार पर किया जा रहा है या नहीं। अदालत ने पाया कि प्रशासन ने भीड़ के व्यवहार पर न तो कोई अध्ययन कराया, न किसी विशेषज्ञ की राय ली और न ही इस विषय पर कोई वैज्ञानिक शोध अपनाया।

    कोर्ट ने कहा कि मथुरा की धार्मिक भीड़ राजनीतिक रैलियों या खेल आयोजनों की भीड़ से अलग होती है। यहां आने वाले लोग आस्था से प्रेरित होते हैं और सामान्यतः शांतिपूर्ण होते हैं, लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान एक साथ आगे बढ़ने की प्रवृत्ति के कारण अचानक भगदड़ का खतरा बढ़ जाता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "धार्मिक भीड़ और अन्य प्रकार की भीड़ को एक समान मानना न केवल अकादमिक दृष्टि से गलत है, बल्कि प्रशासनिक रूप से भी खतरनाक है। इससे ऐसी भीड़ पर भी वही रणनीति लागू की जाती है, जो उग्र या विरोध प्रदर्शन वाली भीड़ के लिए बनाई गई होती है, जिससे भ्रम, अव्यवस्था और कई बार भगदड़ की स्थिति पैदा हो जाती है।"

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मथुरा जैसा हजारों वर्ष पुराना धार्मिक नगर केवल दस वर्ष के मास्टर प्लान से संचालित नहीं किया जा सकता। इसे प्रशासनिक विफलता बताते हुए कोर्ट ने कहा कि "जिस शहर का धार्मिक महत्व शाश्वत है, उसका विकास दस वर्ष में समाप्त होने वाले मास्टर प्लान के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में भीड़ व्यवहार विज्ञान पर कोई व्यवस्थित पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है। इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में भीड़ के प्रवाह, घनत्व विश्लेषण, जोखिम मूल्यांकन, भीड़ प्रबंधन कानून और भगदड़ की घटनाओं के अध्ययन से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं।

    साथ ही कोर्ट ने भीड़ विज्ञान, बड़े सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा और शहरी जोखिम प्रबंधन के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने, बड़े आयोजनों की योजना बनाते समय प्रशिक्षित भीड़ विशेषज्ञों की सेवाएं अनिवार्य करने तथा इस विषय पर एक वैधानिक आयोग गठित करने की भी सिफारिश की।

    मूल याचिका पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को विकास प्राधिकरण के समक्ष नया आवेदन देने की अनुमति दी और कहा कि प्राधिकरण सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में राज्य सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार उस पर निर्णय ले। तब तक ध्वस्तीकरण के आदेश पर रोक बरकरार रहेगी।

    Next Story