उकसावे का कोई तत्व नहीं: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने नकल के आरोप में फटकार के बाद स्टूडेंट की आत्महत्या मामले में स्कूल अधिकारी के खिलाफ केस रद्द किया
Amir Ahmad
10 Feb 2026 1:45 PM IST

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने रायबरेली स्थित सेंट पीटर्स स्कूल के सहायक प्रधानाचार्य के खिलाफ दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC की धारा 306) के आपराधिक मुकदमा रद्द किया।
बता दें यह मामला छह साल के एक स्टूडेंट की आत्महत्या से जुड़ा था जिसे परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया था।
जस्टिस पंकज भाटिया ने स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने स्टूडेंट को आत्महत्या के लिए उकसाया साजिश रची या जानबूझकर ऐसी कोई मदद की, जो सीधे तौर पर आत्महत्या का कारण बनी हो।
मामले के अनुसार बच्चे को परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया। उस समय स्कूल के प्रधानाचार्य मौजूद नहीं थे, जिसके बाद स्टूडेंट को सहायक प्रधानाचार्य के समक्ष पेश किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बच्चे को केवल सख्त चेतावनी दी गई और किसी भी स्तर पर न तो शारीरिक दंड दिया गया और न ही कोई अपमानजनक व्यवहार किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि बच्चे द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट में केवल नकल पकड़े जाने का उल्लेख है लेकिन न तो सहायक प्रधानाचार्य का नाम लिया गया और न ही उनके खिलाफ कोई सीधा आरोप लगाया गया है। FIR में भी याचिकाकर्ता के विरुद्ध किसी प्रकार का स्पष्ट आरोप नहीं है।
अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की कार्यवाही केवल मृतक स्टूडेंट की बहन के बयान के आधार पर शुरू की गई, जिसमें कहा गया कि बच्चे को स्कूल में अपमानित किया गया।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए जस्टिस पंकज भाटिया ने अपने आदेश में कहा,
“रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री और पक्षकारों की दलीलों को देखते हुए, यदि आवेदक की ओर से उकसावे, साजिश या जानबूझकर सहायता का कोई साक्ष्य नहीं है, जो सीधे तौर पर आत्महत्या का कारण बना हो, तो IPC की धारा 306 के तहत कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों के आलोक में यह कार्यवाही रद्द किए जाने योग्य है।”
इन्हीं टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सहायक प्रधानाचार्य के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
यह फैसला आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में सीधे और स्पष्ट उकसावे की कानूनी कसौटी को दोहराता है और यह रेखांकित करता है कि केवल आरोप या भावनात्मक परिस्थितियों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में नहीं घसीटा जा सकता।

