पुलिस कागजात की आपूर्ति निष्पक्ष सुनवाई का मूल तत्व: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने BNSS की धारा 230 के उल्लंघन पर आरोप निरस्त किए
Amir Ahmad
5 Feb 2026 4:21 PM IST

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने यह कहते हुए एक आरोपी के खिलाफ तय किए गए आरोपों को रद्द कर दिया है कि आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई का मूल तत्व है।
अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 230 का पालन किए बिना की गई कार्यवाही निष्पक्ष और स्वतंत्र सुनवाई के सिद्धांत के विरुद्ध है।
जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने BNSS की धारा 528 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि BNSS की धारा 230 का अनुपालन अनिवार्य है। इसके उल्लंघन में किया गया कोई भी ट्रायल कानूनन टिकाऊ नहीं हो सकता।
संक्षेप में, आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 137(2), 87, 352 और 65(1) के साथ-साथ POCSO Act और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम (SC/ST Act) के तहत आरोप लगाए गए।
ट्रायल कोर्ट ने 6 जनवरी, 2025 को आरोपपत्र पर संज्ञान लिया था और 4 अप्रैल 2025 की तिथि आरोप तय करने के लिए निर्धारित की थी।
हाइकोर्ट में आरोपी की ओर से अधिवक्ता दिव्यांशु पाठक ने दलील दी कि इटावा स्थित POCSO मामलों की विशेष अदालत ने BNSS की धारा 230 के तहत अनिवार्य रूप से दिए जाने वाले पुलिस कागजात और दस्तावेज आरोपी को उपलब्ध नहीं कराए।
उनका कहना था कि इन दस्तावेजों के बिना आरोपी को BNSS की धाराओं 261 और 262 के तहत आरोपमुक्ति का आवेदन दाखिल करने के वैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया गया।
वहीं राज्य सरकार और निजी प्रतिवादी की ओर से कहा गया कि पुलिस कागजात की प्रतियां आरोपी को दी गई थीं और आदेश पत्र पर उसके हस्ताक्षर इस बात का प्रमाण हैं।
यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी की उपस्थिति में ही संज्ञान लिया गया था और उसे आरोपमुक्ति आवेदन दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, जिसके बाद आरोप तय कर दिए गए।
रिकॉर्ड और आदेश का अवलोकन करने के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि यद्यपि आदेश के हाशिये पर आरोपी के हस्ताक्षर हैं, लेकिन आदेश में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि BNSS की धारा 230 के तहत पुलिस रिपोर्ट और दस्तावेज उपलब्ध कराए गए। केवल हस्ताक्षरों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 230 का अनुपालन कोई साधारण औपचारिकता नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई का सार है। यह प्रावधान मजिस्ट्रेट को यह दायित्व सौंपता है कि वह आरोपी को बिना देरी के पुलिस रिपोर्ट और बयान उपलब्ध कराए और किसी भी स्थिति में यह अवधि आरोपी के पेश होने के 14 दिनों से अधिक न हो।
हालांकि, हाइकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि आरोप तय करने की तिथि निर्धारित करना ही अवैध था।
अदालत ने कहा कि यह पहले से अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि आरोपी आरोपमुक्ति का आवेदन दाखिल करेगा या नहीं, इसलिए आरोप तय करने की तिथि निर्धारित करना अपने आप में गलत नहीं है।
लेकिन चूंकि BNSS की धारा 230 का पालन नहीं किया गया, इसलिए हाइकोर्ट ने 4 अप्रैल, 2025 को तय किए गए आरोपों को निरस्त कर दिया।
साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी को एक सप्ताह के भीतर सभी पुलिस कागजात उपलब्ध कराए जाएं और इसके बाद उसे BNSS की धाराओं 261 और 262 के तहत आरोपमुक्ति का आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी जाए।

