सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी डर का कारण बन गया': अंतरधार्मिक जोड़ों की उत्पीड़न पर NHRC की चुप्पी पर हाईकोर्ट में तीखी टिप्पणी, बेंच में मतभेद
Amir Ahmad
29 April 2026 5:48 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की भूमिका को लेकर सुनवाई के दौरान खंडपीठ के दो जजों के बीच असामान्य मतभेद देखने को मिले।
जस्टिस अतुल श्रीधरन ने NHRC की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अंतरधार्मिक संबंधों में रहने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक स्थान पर साथ कॉफी पीना तक भय का कारण बन गया है, जबकि आयोग ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान नहीं लेता।
हालांकि जस्टिस विवेक सारन ने इन व्यापक टिप्पणियों से असहमति जताई और कहा कि बिना सभी पक्षों को सुने इस प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणियां उचित नहीं हैं।
मामला टीचर्स एसोसिएशन मदरिस अरबीया' की याचिका से संबंधित है, जिसमें उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के विरुद्ध जांच के लिए एनएचआरसी द्वारा आर्थिक अपराध शाखा को दिए गए निर्देश को चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि प्रथम दृष्टया NHRC अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, जबकि वह उन मामलों में सक्रिय नहीं दिखता जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले, भीड़ हिंसा या अंतरधार्मिक जोड़ों के उत्पीड़न के आरोप सामने आते हैं।
अदालत ने टिप्पणी की,
“विभिन्न समुदायों के व्यक्तियों के बीच संबंधों के कारण उत्पीड़न की स्थिति ऐसी हो गई है कि अलग धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी भय का विषय बन गया है।”
जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि उनके समक्ष ऐसा कोई उदाहरण नहीं रखा गया, जिसमें NHRC या राज्य मानवाधिकार आयोग ने ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो।
दूसरी ओर, जस्टिस विवेक सारन ने कहा कि NHRC उस समय अदालत में प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा था और जब ऐसे गंभीर अवलोकन किए जा रहे हों तो संबंधित पक्षों को सुनना आवश्यक है।
उन्होंने कहा,
“यदि मामले के गुण-दोष या एनएचआरसी की भूमिका पर कोई टिप्पणी करनी थी तो सभी संबंधित पक्षों को सुनना चाहिए था।”
हालांकि, जस्टिस सारन ने NHRC को नोटिस जारी करने और उसके आदेश पर पहले से लगी अंतरिम रोक जारी रखने के निर्णय से सहमति व्यक्त की।
मामले की आगे सुनवाई NHRC के जवाब के बाद होगी।

