उत्तर प्रदेश पुलिस की वेबसाइट पर सभी आरोप पत्र अपलोड करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज

Amir Ahmad

7 Jan 2026 3:08 PM IST

  • उत्तर प्रदेश पुलिस की वेबसाइट पर सभी आरोप पत्र अपलोड करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज

    इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 2020 में दायर उस जनहित याचिका खारिज की, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि प्रत्येक मामले में जांच पूरी होने के 24 घंटे के भीतर आरोप पत्र को उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया जाए।

    जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की पीठ ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के निर्णय पर भरोसा करते हुए कहा कि आरोप पत्र सार्वजनिक दस्तावेज नहीं होते और उन्हें सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध कराना दंड प्रक्रिया संहिता की व्यवस्था के विपरीत है।

    हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस निर्णय का हवाला दिया जिसमें स्पष्ट किया गया कि आरोप पत्रों को सार्वजनिक डोमेन में डालना अभियुक्त, पीड़ित और जांच एजेंसी के अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।

    साथ ही यह भी कहा गया कि ऐसा करना आपराधिक प्रक्रिया की विधिक संरचना के अनुरूप नहीं है।

    यह जनहित याचिका मोहम्मद इरफान सिद्दीकी द्वारा दायर की गई थी जिसमें राज्य के सभी थानों में दर्ज मामलों के आरोप पत्रों को पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश देने की मांग की गई।

    याचिकाकर्ता ने यह भी आग्रह किया था कि जांच पूरी होने के बाद यथासंभव 24 घंटे के भीतर आरोप पत्र अपलोड किया जाए।

    इसके अतिरिक्त याचिका में यह भी मांग की गई थी कि संबंधित पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि आरोप पत्र की प्रमाणित प्रति अभियुक्त, उसके प्रतिनिधि, पैरोकार या वकील को आवेदन किए जाने के 24 घंटे के भीतर उपलब्ध कराई जाए।

    राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल किया था। सरकार की ओर से कहा गया कि कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जो जांच के बाद तैयार किए गए आरोप पत्र को वेबसाइट पर अपलोड करने का दायित्व पुलिस पर डालती हो।

    यह भी तर्क दिया गया कि ऐसा करना न्यायालय की प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप के समान होगा विशेष रूप से उन मामलों में जहां आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है या किया जाना प्रस्तावित है।

    सुप्रीम कोर्ट के तर्कों को अपनाते हुए इलाहाबाद हाइकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत देने का कोई औचित्य नहीं है।

    पीठ ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है और इसे निरस्त किया जाना उचित है।

    इसी आधार पर हाइकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की।

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