मकान गिराने पर तीन सरकारी अधिकारियों के विरोधाभासी दावे से हाईकोर्ट हैरान, पूछा- फिर तोड़फोड़ किसने की?

Amir Ahmad

27 Aug 2026 3:08 PM IST

  • मकान गिराने पर तीन सरकारी अधिकारियों के विरोधाभासी दावे से हाईकोर्ट हैरान, पूछा- फिर तोड़फोड़ किसने की?

    वाराणसी में अदालत के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के बावजूद मकान गिराए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के विरोधाभासी दावों पर हैरानी जताई। अवमानना की कार्यवाही का सामना कर रहे तीनों अधिकारियों ने शपथपत्र देकर मकान गिराने से इनकार किया। हालांकि, इनमें से एक अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि 11 जून 2026 को पुलिस बल के साथ वह मौके पर मौजूद था, जबकि उसी दौरान मकान गिराने की कार्रवाई हुई।

    जस्टिस विकास बुधवार ने इस विरोधाभास पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बेहद हैरानी वाली बात है कि एक ओर मकान गिराने की कार्रवाई से इनकार किया जा रहा है और दूसरी ओर संबंधित अधिकारी ने मौके पर अपनी मौजूदगी स्वीकार की।

    मामला वाराणसी के दलमंडी स्थित मकान संख्या 39/12 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने 15 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 331(1)(2) के तहत जारी नोटिस को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। उसने अधिकारियों को मकान गिराने या उसके कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग की।

    मामले की सुनवाई के बाद 7 मई 2026 को हाईकोर्ट ने नई जांच समिति गठित करने का निर्देश दिया। समिति में स्वीकृत सूची में शामिल कम से कम एक स्वतंत्र वास्तुकार, नगर निगम का अधिशासी अभियंता और राज्य के किसी अन्य विभाग का एक अधिशासी अभियंता शामिल किया जाना था। समिति को भवन का निरीक्षण कर नगर आयुक्त को रिपोर्ट सौंपनी थी।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि निरीक्षण रिपोर्ट के साथ नया नोटिस जारी किया जाए और याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब देने का अवसर दिया जाए। इसके बाद नगर आयुक्त को मामले पर निर्णय लेना था। तब तक दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया।

    अवमानना याचिका में याचिकाकर्ता ने कहा कि उसने 1 जून 2026 को सक्षम अधिकारी के समक्ष अपनी आपत्ति दाखिल की थी, लेकिन उसकी आपत्ति पर विचार किए बिना 11 जून को उसके परिसर को जबरन गिरा दिया गया।

    नगर आयुक्त की ओर से दाखिल अनुपालन शपथपत्र में कहा गया कि 15 मई को एक नई टीम गठित की गई। इसमें वाराणसी नगर निगम के अधिशासी अभियंता, लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता और वाराणसी विकास प्राधिकरण की स्वीकृत सूची में शामिल स्वतंत्र पंजीकृत वास्तुकार को शामिल किया गया।

    शपथपत्र के अनुसार, संयुक्त निरीक्षण में भवन को बेहद जर्जर और खतरनाक पाया गया। इसके बाद 26 मई को धारा 331(1)(2) के तहत नया नोटिस जारी किया गया। इसके आगे धारा 334(3) के तहत कोई नोटिस जारी नहीं हुआ और नगर निगम ने कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की। नगर निगम का कहना था कि मकान गिराने की कार्रवाई किसी दूसरे विभाग ने की।

    दूसरे अधिकारी ने अपने शपथपत्र में कहा कि 11 जून को मकान गिराने की कार्रवाई लोक निर्माण विभाग ने दलमंडी मार्ग के चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण के लिए की थी। उन्होंने कहा कि वह केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल के साथ मौके पर मौजूद थे। उनका दावा कि 7 मई का हाईकोर्ट आदेश उन्हें याचिकाकर्ता की ओर से कभी नहीं दिया गया और अवमानना अदालत की ओर से नोटिस जारी होने के बाद ही उन्हें इसकी जानकारी हुई।

    वहीं तीसरे अधिकारी ने कहा कि खुर्शीद आलम, मेहताब आलम और जहांगीर आलम द्वारा बेचे गए भवन के हिस्सों को सड़क निर्माण के लिए हटाया गया। उनके अनुसार, याचिकाकर्ता के स्वामित्व वाले शेष हिस्से को नहीं गिराया गया, बल्कि वह हिस्सा पहले से जर्जर था और याचिकाकर्ता के खाली करने के बाद अपने आप गिर गया।

    हाईकोर्ट ने तीनों शपथपत्रों को एक साथ पढ़ने के बाद कहा कि तीनों अधिकारियों के अनुसार उनके द्वारा कोई मकान गिराने की कार्रवाई नहीं की गई।

    पीठ ने कहा कि एक तरफ सभी अधिकारी तोड़फोड़ से इनकार कर रहे हैं, जबकि दूसरे अधिकारी ने उसी दिन पुलिस बल के साथ मौके पर अपनी मौजूदगी स्वीकार की है। अदालत ने इन दावों को विरोधाभासी और हैरान करने वाला माना।

    अब हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को तीनों अधिकारियों के शपथपत्रों पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

    मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होगी।

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