योजना बंद होने के बाद संविदा कर्मियों को सेवा जारी रखने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
8 Sept 2026 12:53 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी योजना के तहत संविदा पर नियुक्त व्यक्ति योजना बंद होने के बाद सेवा में बने रहने के लिए परमादेश की मांग नहीं कर सकता। जब तक नियमितीकरण या समायोजन का प्रावधान करने वाला कोई नियम, विनियम या सरकारी आदेश मौजूद न हो तब तक ऐसे संविदा कर्मी के पक्ष में सेवा जारी रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता।
जस्टिस विकास बुधवार ने कहा कि नियोक्ता की ओर से किसी योजना को जारी रखने या बंद करने का फैसला अदालत में तब तक चुनौती नहीं दिया जा सकता, जब तक कर्मचारी या संविदा कर्मी यह साबित न करे कि उसके साथ मनमानी या भेदभाव किया गया।
अदालत ने कहा,
“जब नियुक्ति संविदा के आधार पर हुई है तो याचिकाकर्ता यह आग्रह नहीं कर सकते कि योजना बंद किए जाने और उसके लागू नहीं होने के बावजूद उन्हें काम पर रखने का परमादेश जारी किया जाए।”
मामला उत्तर प्रदेश में बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (पुरुष) के रूप में काम करने वाले कर्मचारियों से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2012-13 में जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों द्वारा चयन प्रक्रिया के जरिए की गई थी। उन्हें छह हजार रुपये मासिक मानदेय दिया जाता था।
इन नियुक्तियों की शुरुआत केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के 3 जनवरी 2011 के कार्यालय ज्ञापन के आधार पर हुई। इसके तहत अधिक बीमारी के बोझ वाले 235 पिछड़े जिलों में तीन साल के लिए ऐसे स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को संविदा पर रखने की योजना मंजूर की गई।
योजना के तहत केंद्र सरकार को पहले वर्ष 85 प्रतिशत, दूसरे वर्ष 75 प्रतिशत और तीसरे वर्ष 65 प्रतिशत खर्च वहन करना था। बाकी खर्च राज्य सरकार को उठाना था। साथ ही राज्य सरकार को इसी अवधि में अपने संसाधनों से आवश्यक पद सृजित कर उन्हें नियमित आधार पर भरना था।
हालांकि, 26 फरवरी 2014 को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश के मिशन निदेशक ने सर्कुलर जारी कर बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को 31 मार्च 2014 के बाद दोबारा नियुक्त नहीं करने का निर्देश दिया। इस फैसले को अलग-अलग याचिकाओं के जरिए हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने नियुक्ति पत्रों और याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए करार का हवाला देते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति पूरी तरह संविदात्मक थी। उन्हें एक महीने के नोटिस पर हटाया जा सकता था और उनकी नियुक्ति किसी नियमित पद के विरुद्ध नहीं हुई।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने करीब तीन साल तक काम किया लेकिन ऐसा कोई नियम, विनियम या सरकारी आदेश सामने नहीं रखा गया, जिसमें उन्हें नियमित करने, समायोजित करने या नियमित कर्मचारियों के समान दर्जा देने का प्रावधान हो। ऐसे में वे सेवा जारी रखने का परमादेश मांगने के हकदार नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह आरोप नहीं लगाया कि उन्हें हटाए जाने के साथ ही उनकी जगह दूसरे लोगों को संविदा पर नियुक्त किया गया। राज्य का स्पष्ट रुख था कि संबंधित योजना ही बंद की गई। ऐसे में दूसरे संविदा कर्मियों को नियुक्त किए जाने का सवाल भी नहीं उठता।
योजना बंद करने के फैसले की न्यायिक समीक्षा के सवाल पर अदालत ने कहा कि किसी योजना को जारी रखना या बंद करना नियोक्ता के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत इसमें तभी दखल दे सकती है, जब कर्मचारी के साथ मनमानी या भेदभाव किए जाने का मामला सामने आए। मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य रिकॉर्ड पर नहीं था।
रिक्त पदों का हवाला देकर सेवा में बनाए रखने की मांग पर भी अदालत ने राहत देने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि केवल पदों का खाली होना या कुछ सरकारी पत्राचार इस आधार पर नियुक्ति का निर्देश देने के लिए पर्याप्त नहीं है। पदों को भरने से पहले व्यवहारिकता और आवश्यकता समेत कई पहलुओं पर विचार करना होता है।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“इस तरह के व्यापक निर्देश या न्यायिक आदेश के जरिए ऐसा परमादेश जारी नहीं किया जा सकता, जो कानून के विपरीत हो।”
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि वर्ष 2018 के नियमों के तहत नियमित चयन प्रक्रिया को लेकर एक समन्वय पीठ ने 22 जुलाई 2022 को रोक लगाई थी। इसके अलावा, लखनऊ पीठ पहले ही शिव प्रताप मौर्य और 667 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में 31 मार्च 2014 के बाद सेवा जारी रखने की मांग खारिज कर चुकी थी। यह फैसला 20 मार्च 2024 को आया था।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में सेवा जारी रखने के अपने पक्ष में कोई कानूनी अधिकार स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सभी संबंधित रिट याचिकाएं खारिज कीं।


