वकील के मुद्दा नहीं उठाना कहने भर से मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण किसी मुद्दे को नकारात्मक रूप में तय नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
2 Nov 2026 12:03 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण केवल किसी पक्ष के वकील के यह कहने पर कि वह किसी मुद्दे पर जोर नहीं दे रहा है, मुकदमे के दौरान तय किए गए मुद्दों का नकारात्मक निष्कर्ष नहीं दे सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 168(1) के तहत बीमा कंपनी को नोटिस जारी करना जनहित में वैधानिक अनिवार्यता है। किसी पक्ष की सहमति या मुद्दे पर जोर न देने से इस दायित्व को समाप्त नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी ने कहा कि मुकदमे में मुद्दे तय करना न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य चरण है। इससे विवाद के वास्तविक बिंदुओं की पहचान होती है और सुनवाई का दायरा निर्धारित होता है। उन्होंने कहा कि मुद्दों का फैसला न करना ट्रायल कोर्ट के न्यायिक दायित्व का निर्वहन न करने के समान है और इससे पक्षकारों को न्याय देने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
मामले के अनुसार 30 जून 2001 को जमुना देवी बाराबंकी-गोंडा मार्ग पर पैदल घर लौट रही थीं, तभी पीछे से आई एक बस ने उन्हें टक्कर मार दी। 3 और 4 जुलाई 2001 की मध्यरात्रि के दौरान बाराबंकी जिला अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनके पति और तीन बेटों ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 और 163-ए के तहत मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, बाराबंकी में पांच लाख रुपये के मुआवजे का दावा किया।
उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम ने दुर्घटना की जानकारी होने से इनकार किया, हालांकि उसने स्वीकार किया कि बस उसके साथ अनुबंध पर थी। बस का पंजीकृत मालिक पेश नहीं हुआ और उसके खिलाफ एकतरफा कार्यवाही की गई। अधिकरण ने पांच मुद्दे तय किए। इनमें बीमा कंपनी को पक्षकार न बनाने, बस निगम के साथ अनुबंध पर होने के बाद बीमा कंपनी की देनदारी समाप्त होने और बीमा वैध एवं प्रभावी होने से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
14 फरवरी 2007 को निगम के वकील ने कहा कि वह इन मुद्दों पर जोर नहीं दे रहे हैं। इसके आधार पर अधिकरण ने तीनों मुद्दों का नकारात्मक जवाब दे दिया, बिना किसी स्वतंत्र कानूनी या तथ्यात्मक चर्चा के।
मृतका की सालाना आय 15,000 रुपये मानते हुए और 16 का गुणक लागू करके अधिकरण ने 5 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज के साथ 1,69,500 रुपये का मुआवजा दिया।
निगम ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि वह बस का मालिक नहीं था और न ही चालक उसका कर्मचारी था। निगम के मुताबिक, बस मालिक के साथ हुए अनुबंध के तहत देनदारी बस मालिक और बीमा कंपनी की थी।
दूसरी ओर, दावेदारों ने मुआवजा बढ़ाने की मांग करते हुए कहा कि गृहिणी रही मृतका की काल्पनिक आय कम से कम 3,000 रुपये प्रति माह मानी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकरण ने मुद्दे तय करने के बाद उनमें से तीन का फैसला केवल वकील के बयान के आधार पर कर दिया। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 168(1) और उत्तर प्रदेश मोटर वाहन नियम, 1998 के नियम 207 को साथ पढ़ते हुए कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी को नोटिस जारी करना अधिकरण का अनिवार्य दायित्व है। कानून में 'shall' शब्द का इस्तेमाल इस दायित्व को अनिवार्य बनाता है।
कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी को नोटिस जारी करने का वैधानिक दायित्व केवल मुकदमे के पक्षकारों के निजी अधिकारों पर आधारित नहीं है, इसलिए पक्षकारों की सहमति से इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।
मोटर वाहन अधिनियम को निर्दोष तीसरे पक्ष के दुर्घटना पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाया गया कल्याणकारी और सामाजिक सुरक्षा कानून बताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वकील का किसी मुद्दे पर जोर न देना, पक्षकार की ओर से उस मुद्दे को छोड़ देना नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुद्दे को छोड़ने का सवाल तथ्य का विषय है, जिसे बाकायदा plead यानी अभिवचन में उठाया जाना चाहिए। जनहित में बनाए गए वैधानिक प्रावधान को केवल मुद्दे पर जोर न देने के सामान्य बयान से निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में मुद्दे को छोड़ने संबंधी कोई अभिवचन मौजूद नहीं था। साथ ही, संबंधित मुद्दे केवल परिवहन निगम के निजी हित तक सीमित नहीं थे।
कोर्ट ने कहा कि किसी मुद्दे के बारे में केवल यह लिख देना कि उसे नहीं उठाया गया, उसके कानूनी और तथ्यात्मक परिणामों की जांच किए बिना, तर्कपूर्ण निर्णय का विकल्प नहीं हो सकता।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। मुद्दा संख्या 2, 3, 4 और 5 पर अधिकरण के निष्कर्ष रद्द कर दिए गए और मामले को नए सिरे से फैसला करने के लिए वापस भेज दिया गया। पक्षकारों को 10 दिसंबर 2026 को अधिकरण के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया। अधिकरण को बीमा कंपनी को लगातार पक्षकार मानकर कार्यवाही करने को कहा गया। पहले जारी की जा चुकी मुआवजा राशि को नए फैसले के अधीन रखा गया।

